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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



नई रोशनी बन के आयी


योगेन्द्र कुमार निषाद


           
वो जो हैं मेरे जिन्दगी बन के आयी।
खुशी से बड़ के खुशी बन के आयी।

लरजतें से होठों पे नगमा नया ले,
वो होठों पे मेरे हँसी बन के आयी।

सुकूनों से भी हैं जयादा नशा अब,
प्याला भरा मयकशी बन के आयी।

गमों की है अब कोई फिकर नही 
वो है अब ले नई रोशनी बन के आयी।
                  

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