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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



सूरज आग उगलने लगा है


विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'


           
सूरज आग उगलने लगा है
पात पात अब जलने लगा है

गर्मी गुस्सा बन कर फूटी
मौसम आज बिफरने लगा है

तस पानी की बढ़गई इतनी
भोजन आज बिसरने लगा है

सर से पैर तक बहे पसीना
झरना जैसे झरने लगा है

व्यग्र पहिचाने उसको कैसे
जो बाँध दुपट्टा चलने लगा है
                  

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