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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



पछताए शोर को अमन समझकर


सुशांत सुप्रिय


           
अमावस की रात को रोशन समझकर 
पछताए शोर को अमन समझकर 

दिल लगा बैठे हम पत्थर की मूरत से 
ग़मज़दा हुए उसे ईश्वर का करम समझकर 

बहुत इतराते फिरे पहले हम अपने मुक़द्दर पर 
बाद में बहुत रोए हत्यारे को महरम समझकर 

भरोसा कर लिया मुखौटे लगाए लीडरों पर 
बहुत पछताए कसाई को बाग़बान समझकर 

ऐ खुदा तू काश देता थोड़ी दुनियादारी हमें 
ठगे न जाते कलयुग में सब को हमदम समझकर 


                     

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