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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



दिखा दूँगा तुम्हें


सुशांत सुप्रिय


           
लड़ के ज़ुल्मो-सितम से दिखा दूँगा तुम्हें 
जूझ कर अपने मुक़द्दर से दिखा दूँगा तुम्हें 

हो चुकी होगी यहाँ दहशतज़दा जब कायनात 
रोशनी की पैरवी करके दिखा दूँगा तुम्हें 

भँवर जब बनने लगेंगे , आएँगे जब चक्रवात् 
हौसलों की उड़ान भरके दिखा दूँगा तुम्हें 

आदमी को आदमी जब मार करके खाएगा 
इंसानियत के कारनामे करके दिखा दूँगा तुम्हें 

जब उठेगा कोई ख़ंजर आदमी की ज़ात पर 
तहज़ीब सीख जानवर से मैं दिखा दूँगा तुम्हें 

                     

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