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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



ठिकाने बदलते रहे हैं


राजेन्द्र वर्मा


           
न तेरे रहे हैं, न मेरे रहे हैं,
ये अपने ठिकाने बदलते रहे हैं।
 
ये टाटा, ये बिरला, उन्हीं के रहे हैं,
जो इनकी तिजोरी को भरते रहे हैं।
 
हमें ख़ार का ख़ौफ़ क्योंकर दिखाता?
अरे! वे हमारे, हम उनके रहे हैं।
 
ये अच्छा सबक़, भूख से मर गये वे,
जो तेरे लिए ढोल-ताशे रहे हैं।
 
समुन्दर में बारिस हुई ख़ूब, लेकिन
मेरे खेत प्यासे-के-प्यासे रहे हैं।
 
हमारा बदन गोलियों से छिदा है,
हमीं उनके हरदम के साये रहे हैं।
 

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