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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



हार जातीं मुश्किलें


राजेन्द्र वर्मा


           
हम क्षमाप्रार्थी इधर बजरँगबली के सामने,
वे उधर भी सर झुकाये हैं वली के सामने।
 
यों तो हम झुकते नहीं हैं हर किसी के सामने,
किन्तु नतमस्तक हैं तेरी सादगी के सामने।
 
बुद्धि समझाती रही, पर मन पिघलता ही रहा 
चंचला के नैनों में तिरती नमी के सामने।
 
 
शोक संवादों में घायल हो गयी संवेदना,
शब्द घुट कर रह गये उनकी हँसी के सामने।
 
देखिए, पृथ्वी पे हहराने लगी भागीरथी,
हार जातीं मुश्किलें भी आदमी के सामने।
 

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