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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



तोड़ लिये गुल सब गुलज़ार से


नरेंद्र श्रीवास्तव


  
तोड़  लिये  हैं सब  गुल ,  गुलज़ार  से।
वास्ता  अब   क्यों  न. पड़े  ख़ार  से ?

चूर रह के मद में, अलग अपनों से रहा।
मुश्किल निपटना हो रहा है दो-चार से।।

नकली सामान का व्यापार खूब चल रहा।
ख़ुद भी वही सामान ले आए बाज़ार से।।

सब  बुरे  नहीं  हैं , ये  सभी जानते  हैं।
परेशाँ  हैं  मगर सब , चंद मक्कार  से।।

बेख़ौफ़  दोषी घूमते, पैसों की ताकत लिए।
बच निकलेंगे कानूनी,दाँव-पेंच अधिकार से।।

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