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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



फ़िर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते!


मणि बेन द्विवेदी


  
नज़रों में कभी ख्वाब सुहाने नहीं आते।
होठों पे अब ख़ुशियों के तराने नहीं आते!

गुज़री तमाम उम्र जिनकी याद में मेरी। 
जब से हुए वो ग़ैर सताने नहीं आते। 

आँखों से मेरे ले गए वो नींद चुरा कर। 
यादे तेरी अब मुझको सुलाने नहीं आते।  

सारे जहां का दर्द मुक़द्दर में लिख दिया! 
गुलशन में बहारों के ज़माने नहीं आते। 

या रब  मिला दे खाक़ में कुछ तो सकूँ मिले! 
उल्फ़त-ए-वफ़ा रस्म निभाने नहीं आते। 

रूठी रही ख़ुशियाँ मेरी तक़दीर भी रूठी 
रूठे हुए रिश्तों  को मनाने नहीं आते। 

है आरज़ू जीने की न मरने का डर मुझे! 
नादाँ हूँ ज़ख़्म दिल के दिखाने नहीं आते। 

बेज़ार हो सिसक रही  मासूम आबरू! 
दरिंदों को सबक़ भी सीखाने नहीं आते। 

मत रोको इन मासूम को छूने दो आसमाँ 
फ़िर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते!

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