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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



वो मेरे नहीं है !


जस राज जोशी उर्फ़ लतीफ़ नागौरी


फासले ऐसे भी होंगे, कभी ऐसा सोचा भी न था,  
मेरे सामने बैठे हैं वो मेरे नहीं है !

लिल्लाह ये गज़ब है इश्क की मज़बूरियां 
अपनी मगरूरी में सबसे कहते हैं, वो मेरे नहीं हैं !

तर्के इश्क का शिकवा गिला किससे करूं मैं, 
कोई उनसे पूछे तो हंसकर कहते हैं वो मेरे नहीं है !

पहले तो इश्क किया और बेवफ़ा हो गये 
रूठकर यही कहते हैं वो मेरे नहीं है !

आतिशे इश्क में जल-भुन रहा हूँ मैं यारब 
बेवजह सभी से कहते हैं वो मेरे नहीं हैं !

बज़्म में आये और अनमने से है यारों 
बेखौफ़ सभी से कहते हैं वो मेरे नहीं है !

ए लतीफ़ ग़र यही इश्क उम्दा रस्म है
तो फिर क्यूं कहते हैं वो मेरे नहीं है !
 

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