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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



तासीरे-इश्क


जस राज जोशी उर्फ़ लतीफ़ नागौरी


ग़र भूलाने की लत है, हमें भूल जाओ 
तुम्हें भुलाने में बरसों लगेंगे !

[१] तर्के इश्क में रूठना इतराना है ग़लत, 
रूठे सनम को मनाने में बरसों लगेंगे 

[२] तर्के इश्क में न कुछ कहा न किया, 
मैंने बेवजह रूठे को मानाने में बरसों लगेंगे !

[३] बेबाक हुस्ने पैकर से क्यूं फ़िदा हो गए हम, 
इश्क की रस्म निभाने में बरसों लगेंगे !

[४] बस ज़रा सी बात पे रूठ के अलविदा कह गए, 
रूठे सनम को मनाने में हमें बरसों लगेंगे !

[५] तेरी इश्क की अदाएं मिसाले आशिकी है ज़ालिम,
 वसले इश्क को निभाने में हमें बरसों लगेंगे !

[६] ए लतीफ़ इश्क की तासीर को कोई क्या समझेगा,
 इस रस्म को निभाने में हमें बरसों लगेंगे
 

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