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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



मजबूर था


डॉ० डी एम मिश्र


जुल्म और अन्याय सहने    के लिए मजबूर था
कर भी क्या सकता था वो बाहैसियत मज़दूर था।

जब हुआ था   हादसा  सब हाथ बाँधे थे खड़े
ग़़म किसे था, ग़़म का लेकिन ढोंग बदस्तूर था।

छै  महीना  भी न बीता  हो गयी  टीबी उसे
गाँव  से  आया हुआ  था  हौसला भरपूर था।

चुक गयीं साँसे जब उसकी आ गये सब मददगार
एक भी इन्साँ न था मजमा वहाँ पे  ज़रूर था।

हैसियत भी थी बड़ी और धन भी था उसके अकूत
वो किसी को क्या समझता मद में अपने चूर था।

चश्मदीद  गवाह  था वो  इसलिए  मारा गया
साथ वो सच के खड़ा था बस यही तो कु़़सूर था ।  
 

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