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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



दोस्ती अच्छी लगी


डॉ० डी एम मिश्र


फ़ितरतों से दूर उसकी मुफ़लिसी अच्छी लगी
उसका घर अच्छा लगा , उसकी गली अच्छी लगी।

वो पुजारी है बजाये शंख उसकी बात और
हाथ छोटे हैं हमारे बाँसुरी अच्छी लगी।

ना कहीं कुंडी लगी है , ना कहीं ताला जड़ा
इन परिन्दों को हमारी कोठरी अच्छी लगी।

एक दुश्मन त्यागकर वर्षों पुरानी दुश्मनी
फिर गले आकर लगा तो दोस्ती अच्छी लगी।

फिर नदी के पास जायें , फिर कुआँ खोदें कोई
इसलिए प्यासे लबों की तश्नगी अच्छी लगी।

इन पतंगो का जुनूँ भी  क़ाबिले तारीफ़ है
चार पल की ज़िंदगी हिम्मत भरी अच्छी लगी।  
 

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