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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



दुआ से काम होते हैं!


धर्मेन्द्र अरोड़ा"मुसाफ़िर"


 
दवा से जो नहीँ होते दुआ से काम होते हैं!
जहाँ में आज भी ऐसे करिश्मे आम होते हैं!!

गलत राहों से' जीवन में हमेशा दूर तुम रहना!
बुरे हर काम के देखो बुरे अंजाम होते हैं!!

निराला सा चलन देखा जहाँ में आज लोगों का!
बगल में हैं छुरी रखते जुबाँ पे राम होते हैं!!

दिलों में इस ज़माने के पनपती साज़िशें हरदम!
बशर की जान के तो बस ज़रा से दाम होते हैं!!

मुसाफ़िर इस गज़ल में भी पते की बात को कहता!
भरोसा हो जिन्हें खुद पर नहीँ नाकाम होते हैं!!

 

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