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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



ज़ब्त अपना खोने लगे


अरविन्द कुमार 'असर '


  
रफ़्ता रफ़्ता ज़ब्त अपना सब के सब खोने लगे 
दास्ताँ सुनकर मेरी सब लोग फिर रोने लगे

आखिरश बरसात को फिर आ गया उनपर तरस
लोग सूखे खेतों में ही बीज जब बोने लगे

यूँ  हुआ फिर चलना भी दुश्वार उनका हो गया
लोग मन पर ख़्वाहिशों का बोझ जब ढोने लगे

सुब्ह चलने के लिए ढेरों दवाएं फाँक लीं
खा के गोली नींद की हम रात में सोने लगे

कुछ न कुछ तो मस्अले हल हो ही जायेंगे, अगर
आदमी की जानवर से गुफ़्तगूँ होने लगे

यम,नियम, संयम सभी के पड़ गये ढीले,'असर '
देखते ही बहती गंगा हाथ सब धोने लगे.

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