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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



दोहे रमेश के मातृ दिवस पर


रमेश शर्मा


 
माँ के दिल को पढ लिया,जिसने भी इंसान !
नही जरूरी बाँचना,…..गीता और कुरान !!
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गुस्से मे भी जब नही,मुझको कहा खराब !
माँ की ममता का तुम्हे,क्या दूँ और हिसाब !!
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मेरे अपने आप ही,. बन जाते हैं काम !
माँ के आशीर्वाद का, देख लिय परिणाम !!
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माँ से बढ़कर कब हुआ, कोई और मुकाम !
चाहे आवें साथ मे, मिल कर देव तमाम !!
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वो चूल्हे की रोटियाँ,…वो अरहर की दाल!
जीवन मे इनका पडा,माँ के बिना अकाल! !
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होता है इस भाँति कुछ,माँ का आशीर्वाद!
जैसे माली पेड को,.देता है जल खाद !!
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पोंछा था जिनसे कभी,.बचपन मे मुंह गाल !
माँ की पेटी से मिले, ..सारे वही रुमाल !!
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ख़त्म रसोई में हुआ , खाना जितनी बार !
माँ ने फांका कर लिया, झूठी मार डकार !!
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इसे करिश्मा ही समझ ,कुदरत का इंसान !
माँ को बच्चा गंध से, . .लेता है पहचान !!
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भले बुरे के बीच का, ऐसे समझें फर्क !
जैसे बच्चों के लिए, माता दिखे सतर्क !!
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उठे दुआओं के लिए,माँ का हरदम हाथ !
रखा नही औलाद ने,. उसे भले ही साथ !!
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वो चूल्हे की रोटियाँ,...वो अरहर की दाल !
जीवन मे इनका पडा,माँ के बिना अकाल ! !
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होता है इस भाँति कुछ,माँ का आशीर्वाद !
जैसे माली पेड को,....देता है जल खाद !!

 

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