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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



दोहे


राजपाल सिंह गुलिया


           
बड़े   निशानेबाज़  हो , करो   नहीं   ये   चूक !
रख  कंधे  पर  ग़ैर  के , चला    रहे    बन्दूक !!

दिन को जब भी दिन कहा , कहा रात को रात !
पची   नहीं    आवाम   को , खरी  हमारी बात !!

भाषण शैली गिर गई  , फिसले   रोज    जबान !
नेता  सोच विचार कर , दें   विवादित     बयान !!

अखर गया कुतवाल को , उसका  एक   सवाल !
केस  बना  कर   लूट का , किया   बरामद माल !!

अब लोगों  के   बीच  से , गायब  हुआ   यकीन !
साँच  झूठ  का   फैसला , करने  लगी   मशीन !!

वो   ही   मिट्टी   फूल   है ,   वो  ही  मिट्टी  शूल !
समय  सभी   को ढालता , मिट्टी  के   अनुकूल !!

चिड़िया  बैठी  डाल  पर , मन  में  गहरी   पीड़ !
पत्थर के  अब  घर   हुए , कहां  बनाए    नीड़ !!

झूठ   सदा   किसका  चला , बता मुझे सरकार !
हाँडी   चढ़ती   काठ     की , कहां  दूसरी  बार !!

हिम्मत   जुटा   वजीर  ने , खरी कही जब बात !
राजा   की   शमशीर   ने , बतला  दी  औकात !!

मानवता   का  कब   तलक , कायम   रहे  वजूद !
फिरे   धर्म  जब   भीड़   में , तन पर मल बारूद !!
 

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