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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



दोहे


नीतू शर्मा


  
पहन मुखौटे झूठ के, करते लोग कमाल । 
जो दिल छलनी कर रहे, वही पूछते हाल ।।  

रसना में रस घोलिए, मत करिए रसहीन । 
रसना में रस ना रहें, सब कुछ लेती छीन ।।  

धनिक जनों को देखिये, कितना है अभिमान । 
बात करें तो यूं लगे, करते ज्यों अहसान ।।  

काया सुन्दर पाइ के, क्यूँ इतना इतराय । 
यह तन माटी का बना, माटी में मिल जाय ।।  

तेरा मेरा क्यों करे,क्या तू लेगा पाय । 
समय निकलता हाथ से,अंतकाल पछताय ।।  

हरि ही जग का सार है, बाकी सब बेकार । 
हरि सुमिरन में मन लगा, तज दे विषय विकार ।।  

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