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वर्ष: 2, अंक 37, मई(द्वितीय), 2018



दोहे


डॉ.गोपाल राजगोपाल


१. देखी जिसने रात भर,आतिश की बौछार । 
    वो बच्चा अब ढूंढता,कचरे में त्योहार  ।।

२.बंटवारे ने खींच दी,घर में इक दीवार ।
   पिक्चर का परदा बनी,लगी फिल्म 'परिवार' ।। 

३.दुःख से एक सदस्य के,कुनबा दुखी तमाम ।
   इक वाहन का हादसा ,मीलों लंबा जाम ।।

४.सफल सभा की बस यही,इतनी सी पहचान ।
   जेबें काटे जेबकट ,श्रोता अन्तर्ध्यान  ।।

५.रोटी की तस्वीर को,देखो करते चेट ।
    भूख मिटा लो आँख की,फिर देखेंगे पेट ।।

६.भरकर कोई पेन में,लिखता प्यारी बात ।
    मुख पर कोई ढोलता ,स्याही भरी दवात ।।

७. जो बरगद की मूल थे,पनपा जिनसे वंश ।
     बैठ अकेले झेलते,तिरस्कार के दंश ।।

८.तब तक मजा उड़ान का,जब तक डोरी संग ।
    कटी पतंगों के लिये ,अम्बर कितना तंग ।।

९.वर्तमान का हो भले ,कड़ा-कसैला स्वाद ।
    लौटा करता है विगत ,बनकर मीठी याद ।।

१०.सबै भूमि गोपाल की,अन्तिम यही  निचोड़ ।
     कब्ज़ा कर ले या भले,नक्शा तोड़-मरोड़ ।।
 

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