Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 1, अंक13, मई(द्वितीय), 2017



अपने ही गाँव का

डॉ. राम प्रकाश सक्सेना


   मुझे सबसे बात करने में मज़ा आता है| गाँव में यह प्रथा थी कि कोई अजनबी निकला तो, पुछा जाता था, “कहाँ के हो? भैया, थक गए हो| पानी-वानी पी लो|”

  गाँव छोड़े बरसों हो गए| मकान भी बरेली में बनवा लिया है, नौकरी के सिलसिले में नागपूर में रहना पड़ता है | अब तो पुश्तैनी गाँव जाना ही छूट गया है | लेकिन मेरी यह आदत दिल में बस गई है | परसों ही तो मैं पत्नी के साथ बरेली आया था| स्टेशन से रिक्शे में गर लौट रहा था| अपनी आदत अनुसार पुछा, “क्यों भैया, कहाँ के रहने वाले हो?”

  कुछ चढ़ाई थी| हाँफते हुए बोला, “ ककराला, जिला बदाऊं के|”

  “तुम किसके लड़के हो?”

  “कैलास पहलवान के “|

  “भई, उनने तो पहलवानी में बहुत कमाया | ताज्जुब है, उनके लड़के को रिक्शा चलाना पड़ रहा है, यह बात कुछ समझ में नहीं आई|”

  “बाबू, तुम का उन्हें जानत हो?”

  बात कुछ न बिगड़े, इसलिए मैंने अपनी पहचान नहीं बताई और टालते हुए कहा, “सुना था”,

  “बाबू, ठीक सुना होगा| मेरे बड़े भाई को केंसर हो गया था| उसको बचाने के लिए सब जमीन-जायदाद बेच दी| बापू तो मर गए| भाई भी बच न पाया| अब पेट पालने के लिए रिक्शा चलान पड़ रहा है|”

  पत्नी को इंग्लिश में कहा, “तुम्हारे गाँव का लगता है| यह कहकर पैसे कुछ कम कराओ न, ‘तुम तो हमारे गाँव के हो’|”

  मैंने कहा, “ ऐसी हालत में कुछ पैसे ज़्यादा भी तो दिए जा सकते है|”

  पत्नी ने अपनी खामोशी से उत्तर दे दिया|

  मेरे घर के लिए चढ़ाई बहुत थी और मैं रिक्शे से उतर गया| वे दिन याद आए कि बचपन में उसके पिता को चाचा कहते थे, मुझको भी बचपन में मुगदर चलाना और कुश्ती लड़ना सिखाते थे | मुझे बहुत प्यार करते थे|

  रिक्शे वाले ने कई बार कहा, “चढ़ाई पर आप बार-बार मत उतरा करो, हम को बुरा लगता है| आप तो पैसा बैठना का देते हैं|”

  मैं सोच में पढ़ गया|

  रिक्शे से उतरने के बाद मैंने उसे जानबूझकर सौ रुपए का नोट दिया, जबकि तय चालीस रुपए दिए थे|

  उसने कहा, “ भाई साहब, छुट्टे नहीं हैं |”

  मैंने कहा, “कल आकर दे देना | कल शाम को मुझे कहीं और जगह जाना है|”

  पत्नी ने इंग्लिश में कहा, “हम लोग कल सुबह नागपुर जा रहे हैं| उससे झूठ क्यों बोला?”

  “...क्योंकि मुझे उससे पैसे वापस नहीं लेना हैं|”

x       x       x



  लगभग तीन महीने बाद हम लोग फिर बरेली आए| शाम को मेरा एक पडोसी घर आए| मुझे साठ रुपए देते हुए बोला, “ आपके जाने के बाद एक रिक्शा वाला आया था | आपके न मिलने पर यह रुपए वापस कर गया था| कह रहा था साहब जब वापस आए तो उन्हें दे देना|

  मैंने कहा, “वह तो यहाँ महीनों नहीं आते हैं| उसका उत्तर था, जब भी आये तब दे देना|”

  पास में ही पत्नी खड़ी थीं, उनकी प्रतिक्रिया – “ऐसा ईमानदार आदमी !”

  गंभीर होते हुए मैंने कहा, “ शायद गरीबी के साथं ईमानदारी का करीबी रिश्ता है|

www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें