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वर्ष: 1, अंक13, मई(द्वितीय), 2017



भूखा पेट-भरा पेट

नर्मदा प्रसाद कोरी


   नंदू और चंदू परिचित, काम की तालाश में सुबह-सुबह दूसरे गांव की ओर निकल पड़े हैं, दोनो के घर वालों ने नाश्ते के लिए रोटियां और चटनी की पोटली बांधकर रख दी है। रास्ते में जहां कहीं भी भूख लगेगी तो खालेंगे।

  नंदू सीधा-सादा आदमी था जबकि चंदू थोड़ा चालाक प्रवृत्ति का था। नंदू और चंदू के घर वालों ने उनके जरूरी उपयोगी सामानों की गठरी भी बांध कर रख दी थी। जिसमें आटा, चावल, पहनने, ओढ़ने, बिछाने के कपड़े भी थे। दोनों के सामानों की गठरियों का वजन भी अच्छा खासा था। चंदू चालाक किस्म का था तो उसने दोनों के नाश्ते की पोटली अपने सिर पर रख ली और नंदू को सामानों की दोनों गठरी सिर पर रख दी। नंदू सीधा-सादा आदमी होने के कारण दोनों के सामानो को अपने सिर पर रख कर चल पड़ता है। कुछ 8-10 किलोमीटर चलने के बाद नंदू को थकान होने लगी और उसे भूख भी सताने लगी थी। चंदू रास्ते भर नाश्ते की पोटली में से थोड़ा थोड़ा खाना निकालकर खाता जाता था। इसलिए चंदू का पेट भरा था, उसको भूख कैसे लग सकती थी। जबकि नंदू बोझ से दबा जा रहा था। नंदू ने अपने साथी चंदू से कहा भैया अब तो नाशता कर ही लेते हैं, बड़ी भूख लगी है और थोड़ा सुस्ता भी लेंगे। चंदू अपने साथी नंदू से कहता है, अरे बस अभी खालेंगे, दो किलोमीटर बाद नदी पड़ने वाली है, बस नदी पार करते ही नाश्ता कर लेंगे। बस थोड़ा तो और चलना है फिर गांव भी पास आ गया है। चंदू की मीठी-मीठी बातों से साफ चालाकी झलक रही थी। इसी को कहते है कि भूखा कहे इसी पार खालें और भरा पेट वाला कहे उस पार खायेंगे।

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