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वर्ष: 1, अंक13, मई(द्वितीय), 2017



भरोसा

नर्मदा प्रसाद कोरी


  बचपन के दो अच्छे मित्र राम और श्याम थे। दोनों ने प्राथमिक शिक्षा गांव में ही साथ-साथ प्राप्त की। बचपन की सारी मस्तियां, शैतानियां भी साथ-साथ की। राम और श्याम की दोस्ती गांवभर में बड़ी ही प्रसिद्ध थी। एक दूसरे के बिना एक दिन भी नहीं गुजरता था। दोनों ने हाईस्कूल की पढ़ाई अलग-अलग गांव के हाईस्कूलों में ग्रहण की। अलग-अलग स्कूलों मे पढ़ाई करने के बाद भी सुबह-षाम बिना नागा किए मिला करते थे। चूँकि दोनों की कक्षायें तो एक ही थी, इसलिए पढ़ाई की बातें भी आपस में साझा करते थे।दोनों ने हायर सेकेंडरी प्रमाण-पत्र परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। दोनों को नौकरी भी अच्छी मिल गई। राम और श्याम की शादी भी एक ही शहर में हो गई। दोनों मित्र अपनी-अपनी पत्नियों के साथ बड़े खुश थे। पता नहीं दोनों मित्रों के बीच कौन सी गलत फहमी ने उनकी दोस्ती धीरे-धीरे समाप्त कर दी। पता नहीं दोनों की दोस्ती को किसकी नजर लग गई। गांव के लोग एवं परिचित लोग उनकी दोस्ती टूटने का अफसोस किया करते थे। राम और श्याम दोस्ती टूटने पर कोई पच्चीस साल तक एक दूसरे से नहीं मिले। राम को कोई बड़ी घातक बीमारी हो गई। राम दो साल तक बिस्तर पर ही रहा। बहुत सारा इलाज बड़े-बड़े डॉक्टरों से करवाया गया। लेकिन बीमारी बढ़ती गई। राम को बड़ी असहनीय पीड़ा हो रही थी। अब डॉक्टर और घर के लोग, परिचित, रिश्तेदार भी राम की हालत देख, ऊपर वाले से दुआ करने लगे थे कि अब राम को ऊपर बुला ले।

  कहते हैं कोई चीस-कंजूस आदमी मरणासन्न होता है तो उसकी धन-सम्पत्ति उसकी छाती पर लाकर रख दी जाती है, जिससे मराणासन्न व्यक्ति को अपनी सम्पत्ति साथ होने का सुकून महसूस होता है और वह शांति से अपने प्राण छोड़ देता है। राम ऐसा आदमी नहीं था। फिर उसके प्राण निकल क्यों नही रहे थे, सब इस चिंता में रहते थे।

  एक दिन राम के बचपन का दोस्त श्याम, राम की बीमारी के बारे में सुनकर राम से मिलने उसके घर पहुंचा। राम अपने बचपन के दोस्त श्याम को देखकर खुश हो गया। राम की आँखों में एक अजीब चमक और चेहरे पर बड़ा तेज झलक रहा था। दोनों बचपन की तरह हंसे, मुस्कुराये और खुशी के आंसू भी बहाये। राम ने अपने दोस्त श्याम से बड़े गर्व के साथ कहा मुझे पक्का भरोसा था, मेरा दोस्त मुझसे मिलने जरूर आयेगा। राम बड़ी खुशी और सुकून महसूस कर रहा था। राम की बीमारी तो लाइलाज थी। थोड़ी ही देर में राम ने श्याम का हाथ पकड़कर कहा अलविदा दोस्त। राम की सांसे थम चुकी थीं और आँखे अपने दोस्त श्याम को देख रहीं थीं।

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