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वर्ष: 1, अंक 13, मई(द्वितीय), 2017



क्यों कर मेरा आँगन महक गया है

गोवेर्धन यादव



				अचानक यूंहि तुमसे
				हुई भेंट    थी
				अनायास ही ये अखियां
				मिल लाचार हुई थी	
							 क्यों कर तुम तभी से
							 मुझे याद  आ रहे हो
				अल्हड यौवन क्यों कर
				कुछ खोया खोया सा है
			      और चंचलता क्योंकर
				गहरी चुप्पी साधे  है
							 क्योंकर तभी से  यह
							 एक नया परिवर्तन है
				अज्ञातभय से कांप उठे थे हाथ मेरे
				जब मैने छेडा वीणा नवीना को था
				एक  नया  स्वर  पाया था
				जिसे न चाहकर भी पाया था
							 क्योंकर अब रोम-रोम मेरे
							 गीत तुम्हारे गुनगुनाने लगे है
				अलसाये सपनो  ने
				ली अब एक नई अंगडाई है
				बदल बदलकर रूप नित नये
				मन को मेरे गुदगुदाने लगे है
							 क्यों कर सपने मेरे
						       बहक बहक गये है
				बाग की हर डाली डाली
				झूल गई यौवन के भार से
				मिलकर इनसे पवन झकोंरा
				एक नई फ़ुवांर बांट रहा

							   क्योंकर मेरा आँगन
							   महक महक गया है


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