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वर्ष: 1, अंक 13, मई(द्वितीय), 2017



तुम रोज ही मिलने आते

डॉ० अनिल चड्डा

अच्छा ही है जो सपने नहीं आते,
नहीं तो तुम रोज ही मिलने आते ।

यादों से कब तक लड़ते रहें हम,
हरेक बात में हो तुम्ही याद  आते।

मदद मांग कर भी वो आँखे दिखायें ,
अपने तो कभी भी नहीं काम  आते।

बार-बार वही कर्म, वही हैं माफियां,
एक बार नहीं क्यों सीधे रास्ते वो आते।

‘अनिल’ को किसी से है क्या वास्ता,
क्यों खामख्वाह वो मेरे रस्ते में आते।
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