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वर्ष: 1, अंक13, मई(द्वितीय), 2017



कुचले हुए मानवपुष्प की सुगंध शाश्वत होती है।

लेखक: पद्मश्री डॉ. गुणवंतभाई शाह
अनुवादक : डॉ.रजनीकान्त एस.शाह


   स्वर्णिम लंका में विभीषण एक ही होता है। विभीषण सत्य के लिए लंका का त्याग करता है। कुंभकर्ण लंका के लिए सत्य को छोड़ता है। मानव-इतिहास में कुचले हुए पुष्पों की तादाद कितनी ? तादाद अति अल्प लेकिन महक बहुत ! कभी घर के बगीचे में पूर्णरुपेण खिला गुलाब अकेला ही होता है परंतु उस एक गुलाब के कारण बगीचे की शोभा अपरंपार बढ़ जाती है ! गाँव में कुएं तो अनेक होते हैं लेकिन मीठे जल का एक कुआं ऐसा भी होता है कि गाँव के लोग संघभोजन (समूह भोज) के लिए उसी कुएं के पानी से रसोई पकाते हैं। एक सज्जन व्यक्ति का घर गाँव के लोगों के लिए महत्वपूर्ण समझा जाता है क्योंकि उस घर में सच्चाई की महक होती है। मनुष्य को हमेशा ‘एक’ की गरज रहती है। संसारभर में महात्मा गांधी तो एक ही होंगे !

   सदियों से पुष्प ही कुचले जाते रहे हैं। अनेक पर्णों के बीच एक ही पुष्प सारे पौधे की शोभा बना रहता है। महान वैज्ञानिक आईन्स्टाइन को जर्मनी छोड़ना पड़ा था। ‘केन्सरवोर्ड ’ पुस्तक के लेखक सोल्झिनेत्सिन को हिंसक क्रांति के बाद रशिया छोड़ना पड़ा था। विख्यात अणुविज्ञानी सखारोव रशिया में ही रहेपरंतु कृष्णपिता वासुदेव की तरह बरसों पर्यंत रशिया की कारा में रहे। मोहम्मद पैगंबर को मक्का छोडकर मदीना जाना पड़ा था। जिस प्रकार कृष्ण ने मथुरा को छोड़ा था उसी प्रकार पैगंबर को हिजरत करनी पड़ी थी। गुर्जिएफ सा विचारक खोजना मुश्किल परंतु क्रांति की हवा चलने के बाद उसे भी रशिया छोड़ना पड़ा था। इन सारी घटनाओं को हम ‘विभीषण घटना ’ कह सकते हैं। कुचला जाना और कुचले जाकर सुगंध का प्रसार करना ही उस मानव-पुष्प की नियति होगी !आपातकाल के कारण बंदी हुए जयप्रकाशजी ने एक कविता में लिखा।–

   ‘यह जीवन विफलताओं से भरा है। ’

   मॉस्को के हवाई अड्डे पर हवाई जहाज का जब अवतरण हुआ,वहाँ मुझे मात्र टोलस्टोय का स्मरण हुआ था। ऐसा ही यु.के. के हिथ्रो हवाई अड्डे पर बर्ट्रांड रसेल का स्मरण हुआ था। मैंने बरसों पूर्व पूरे तीन दिन बैरूत में बिताये थे। तब लेबेनोन के मसीहा खलील जिब्रान का स्मरण हुआ था। टर्की में पूरे बाईस दिन बिताये थे तब महान विचारक और आध्यात्मिक विभूति जलालुद्दीन रूमी का अविरत स्मरण रहा था। चंगेज़खान मुस्लिम नहीं था ऐसा पण्डित नेहरू ने लिखा है। उसने आक्रमण किया तब बल्ख के लोगों ने घर-गृहस्थी को छोडकर ईरान और एनेतोलिया की राह पकड़ ली। शुरुआत में जलालुद्दीन रूम नामकस्थान पर रुके थे। अत: वे रूमी कहलाए। उनका हृदय प्रेम से छलाछल था। उन्होंने मानवजाति को संबोधित कराते हुए कहा:

   आप सब आओ ,पुन: पुन: आओ
  आप सब कोई भी हो,
  अग्निपूजक हों या नास्तिक,
  आपने सौ बार व्रत तोड़े हों,
  तो भी चलेगा आओ।
  हमारे दरवाजे
  विषाद के दरवाजे नहीं हैं।
  आप जैसे हैं, उसी रूप में
  चले आओ,चले आओ !’


  टर्की के कोनिया नगर में रूमी की दरगाह है। उस तीर्थ स्वरूपा दरगाह पर कुछ घंटे बिताने का अवसर मुझे सन 2004 में मिला था। वहां पहुँचकरसूफी विद्वान इद्रीस शाह की पुस्तक ‘The Wisdom of the Idiots’ खरीदकर पढ़ने का आनंद उठाया था। केनियानगर में रूमी मेवलाना के रूप में अधिकविख्यात हैं। उस संत का स्मारक सर्वरूपेण म्यूजियम के रूप में सुरक्षित है। वहां से कुछ दूर सूफी नृत्य देखने के लिए एवेनोस के पास जाना था। नृत्य करते समय सूफी भक्त भक्तिभाव में खोकर नृत्यरत रहते हैं। नृत्य के साथ सूफी संगीत के मधुर स्वर का श्रवण होता रहता है। उस नृत्य को ‘सेमा’ कहा जाता है।

  मानेंगे ?जलालुद्दीन रूमी को भी अफ़घानिस्तान के बल्ख नामक अपने जन्मस्थान को छोडकर केनिया तक चले जाने पर विवश होना पड़ा था। बल्ख विद्या और कल्चर का केंद्र था। सेमा नृत्य की परंपरा का प्रारम्भ रूमी ने किया था। उस सूफी नृत्य में जुड़े भक्त अपने पैरों पर चक्राकार घूमते रहते हैं। पृथ्वी की भांति वे दो प्रकार की गति के साथ तल्लीन रहते हैं। नृत्य के दरमियान उनका एक हाथ आकाश की ओर तथा दूसरा हाथ धरती की ओर रहता है। सृष्टि में सबकुछ अविरत गतिशील रहता है। पृथ्वी घूमती है,सूर्य गति करता है,परमाणु घूमते रहते हैं। लहू दौड़ता है और इलेक्ट्रोन भी घूमते हैं ! सूफी पंथ के लोग मानते हैं कि यही यथार्थ है। टर्की के कट्टरपंथी इस्लामी समूहों को सूफी विचारधारा जरा भी पसंद नहीं।

  विख्यात नीतिकथाएं इस दुनिया को देनेवाला ईसप भी टर्की में जन्मा था। ईसप बुद्ध और महावीर का समकालीन था। वह किसी धनवान मालिक का गुलाम था। जीवन के अंतिम बरसों में वह गुलामी से आजाद हुआ था। गुलाम के रूप में जीनेवाला ईसप उस समय एकाकी ही था। अरे ! माशुका के गाल पर दिख रहे एक ही तिल पर समरकन्द-बुखारा न्यौछावर का देने को तत्पर होनेवाले आशिक का उल्लेख गुजराती साहित्य के कविवर उमाशंकर जोशी ने अपनी एक कविता में किया है। पत्थरों के ढेर में मुश्किल से एक पत्थर शालिग्राम के रूप में सार्थक होता है। ‘चेहरों के वन में ’ भटकते वक्त कभी एक चेहरा मनुष्य को ऐसा तो भा जाता है कि वह चेहरा उसे जीवनभर प्रेम दीक्षा देता रहता है। वह चेहरा एक ही होता है।

  इंसान की जिंदगी मात्र किसी एक को खोजने में बीत जाती है। ईश्वर की खोज भी अंततोगत्वा तो ‘एक’ की ही खोज होती है ना ? लंका में कभी दो विभीषण नहीं होते और साकेत में भी कहां दो राम होते हैं ?

  समझदारी:
  गुरुत्वाकर्षण के नियम के जैसा ही
  एक अटल नियम इंसान की
  जिंदगी में भी दिखाई देता है :
  हमें वस्तुओं का उपयोग करते और
  इंसान को प्यार करना सीखना चाहिए,
  नहीं कि
  इंसान का उपयोग करना और वस्तुओं से
  प्रेम करना ।

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