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वर्ष: 2, अंक 36, मई(प्रथम), 2018



हार कर न बैठ तू
डॉ० अनिल चड्डा

 
गर्द उड़ती रही, उड़ के जमती रही,
दास्ताने जिन्दगी बेसबब चलती रही । 
 

मिलते रस्ते रहे, मिलके मिटते रहे,
फेहरिस्त मंजिलों की, रोज़ ही बनती रही ।

स्वप्न बुनते रहे, रोज हम तो नये,
ठोकरों से लोहे सी, दीवार भी ठहती रही।


डूबता सूरज हमें, निराश कर सकता नहीं,
रात इरादों की नये, फ़साने जो कहती रही ।

आँधियों का शोर, परेशान तो करता रहा,
लौ नई उम्मीद की, पर मेरी जलती रही ।

छाले पाँवों में पड़े, राह के अंगार से,
आग दिल की मेरे, और भी तपती रही ।

हर कदम उठा नया, जोश के हुंकार से,
नेमते-खुदा मदद, आप ही करती रही ।

सोच में न डूब तू, हार कर न बैठ तू, 
हर नई उमंग यूँ, बिन मौत ही मरती रही ।
		 
 

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