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वर्ष: 2, अंक 36, मई(प्रथम), 2018



अक्षय तृतीया


विनीता चैल


अक्षय तृतीया को अनंत - अक्षय - अक्षुण्ण फलदायी कहा जाता है | कहते हैं कि अक्षय तृतीया के इस शुभ दिन जो दंपत्ति विवाह सूत्र में बंधते हैं उनका सौभाग्य सदा अखंड रहता है |अक्षय अर्थात ' 'जो कभी न खत्म हो ' अक्षय तृतीया का दिन हिन्दुओं के लिए किसी शुभ एवं मंगल कार्य को प्रारम्भ करने बहुत ही पवित्र दिन माना है | हिन्दू कैलेंडर के प्रमुख तिथियों में 'अक्षय तृतीया ' एक मुख्य तिथि मानी जाती है | मान्यता है कि अक्षय तृतीया की तिथि को जो सौभाग्य एवं सुफल प्राप्त होती है वो कभी खत्म नहीं होता | इस दिन किये जाने वाले कार्य मनुष्य के जीवन में सुफलदायी होते हैं इसलिए इस दिन लोग अधिक दान- पुण्य के कर्म करते हैं | बैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया के रूप मनाया जाता है | अक्षय तृतीया का शुक्लपक्ष अर्थात अमावस्या के पंद्रह दिनों तक जिसमें चाँद धीरे -धीरे बढ़ता है , अक्षय तृतीया शुक्लपक्ष में ही आती है | अक्षय तृतीया को 'अखाती तीज ' भी कहा जाता है |

अक्षय तृतीया के शुभ दिन महर्षि वेदव्यास जी ने महाभारत की रचना पभ की थी | मान्यता है की महाभारत के धर्मराज युधिष्ठिर को अक्षय तृतीया के शुभ दिन ही एक अक्षयपात्र प्राप्त हुई थी | इस अक्षयपात्र की खास की खास विशेषता यह थी कि इस पात्र से भोजन कभी समाप्त नहीं होते थे एवं धर्मराज युधिष्ठिर इसी पात्र द्वारा अपने राज्य के गरीब एवं भूखे प्रजा के लिए भोजन की व्यवस्था करते थे | उड़ीसा के कृषक अक्षय तृतीया के दिन को बहुत ही शुभ मानते हैं | इस शुभ दिन से कृषक अपना खेत जोतना प्रारंभ करते हैं | उड़ीसा के जगन्नाथपुरी में रथयात्रा अक्षय तृतीया के शुभ दिन ही निकाली जाती है | कहते हैं द्वापरयुग में जब श्रीकृष्ण धरती पर अवतरित हुए तो उनके बाल सखा एवं परम मित्र सुदामा कृष्ण से मिलने उनके राजमहल पहुंचे | सुदामा बहुत ही निर्धन ब्राह्मण थे उनके पास अपने मित्र को देने के लिए केवल मुट्ठी भर चावल के दाने थे जिन्हें सुदामा बड़े जतन से अपनी पोटली में बांध कर लाये थे उन्हीं मुट्ठी भर दानों को सुदामा ने अपने मित्र के चरणों में अर्पित किया | अंतर्यामी श्रीकृष्ण अपनी बालसखा के अंतरमन की पीड़ा को समझ सुदामा के टूटी झोपड़ी को आलिशान महल के रूप परिवर्तित कर दिया | कहते हैं तभी से अक्षय तृतीया के दिन दान- पुण्य के शुभ कर्म करने प्रारंभ हुए |

अक्षय तृतीया के शुभ दिन ही माँ अन्नपूर्णा का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है | रसोई के भंडारे को सदैव भरा - पूरा रखने के माँ अन्नपूर्णा की आराधना की जाती है | कहते हैं माँ अन्नपूर्णा की पूजा करने से भोजन का स्वाद बढ़ जाता है और माँ सबों का भूख मिटाकर तृप्त करती है | विष्णु के छठवें अवतार परशुराम जी का जन्मोत्सव भी अक्षय तृतीया के शुभ दिन ही मनाया जाता है | कहते हैं कि त्रेता युग में माँ गंगा को भागीरथी अक्षय तृतीया के शुभ दिन ही धरती पर लेकर आये थे | इसलिए मान्यता है कि अक्षय तृतीया के शुभ दिन गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सारे पाप धूल जाते हैं | अक्षय तृतीया को हिंदूधर्म के साथ -साथ जैन धर्म के लोग भी काफी शुभ मानते हैं एवं अक्षय की पावन पर्व को पूरे देश में बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है | इस दिन आम एवं इमली भगवान को चढ़ाकर अच्छी फसल एवं वर्षा के लिए प्रार्थना की जाती है | जैनि समुदाय के लोग गन्ने के रस इस व्रत का पारणा करते हैं | अक्षय तृतीया के शुभ दिन सोना , चांदी , नवरत्न इत्यादि खरीदना एवं दान करना बहुत ही शुभ माना जाता है |

झारखंड राज्य के बुंडू शहर का नवरात्री का राधा - कृष्ण मंदिर नवरात्रि मंदिर राँची से लगभग 42किलोमीटर दूर बुंडू शहर स्थित है | जहां नवरात्री टोली के विशाल प्रांगण में भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी जी का सुंदर एवं भव्य नवरात्री मंदिर स्थित है | लगभग एक अकड़ भूमि पर मंदिर परिसर के अंतर्गत आता है | श्रीकृष्ण और राधारानी जी का ये मंदिर काफी प्राचीन माना जाता है | मंदिर के विशाल प्रांगण के अंदर जाते ही एक अनुपम शांति की अनुभूति होती है | नवरात्री के इस कृष्ण राधारानी मंदिर में अक्षय तृतीया के दिन कलश की स्थापना की जाती एवं उसके दूसरे दिन से नौ दिन और रात्रि हरीनाम का संकृतन का किया जाता है | यहां होनेवाले कृतन को सुनने के लिए आस- पास के गांव देहात से लोग उपस्थित होते हैं | इस अवसर पर विशाल एवं भव्य मेले का आयोजन भी किया जाता है | नवरात्री मंदिर में रखी गई श्रीकृष्ण की मूर्ति काफी प्राचीन मानी जाती है | एवं यहाँ की श्रीकृष्ण जी मूर्ति के कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं | कहा जाता है कि वर्षों पहले भोला घासी नामक हरिजन समुदाय का एक व्यक्ति अपने जानवरो को चराने पास के जंगल में गए हुए थे | और वहां उन्होंने एक अनुपम दृश्य देखा | श्रीकृष्ण और राधारानी जी रास रचाते क्रीड़ा करते हुए झूला झूल रहे थे | ऐसे अनुपम दृश्य को भोला रह न सके और कौतूहलवश उन्हें पकड़ लिया | परन्तु राधारानी जी वहां से भागने में सफल हो गई और कृष्णजी पाषाण मूर्ति हो गए | उसी रात्रि भोला जी को श्रीकृष्ण और राधा रानी जी के लिए मंदिर स्थापित करने के लिए स्वप्न आया | धीरे- धीरे ये बात सारे नगर में फैल गई | नवरात्री टोली के रहने वाले एक सज्जन महानुभाव पुरुष ने नवरात्री राधारानी मंदिर के लिए अपनी सारी जमीन दान में दे दी | कुछ समय बाद पूरे नगर से चंदा जमा मंदिर निर्माण कार्य प्रारम्भ हुआ | मंदिर का कार्य संपन्न होने पर श्रीकृष्ण जी के उसी पाषाण मूर्ति को प्रतिस्थापित किया गया और राधारानी जी की पीतल से बनी हुई मूर्ति प्रतिस्थापित की गई | और नवरात्री मंदिर में कृष्ण जी और राधा रानी जी तीनों पहर का पूजन एवं भोग अर्पण किये जाने लगे |

नवरात्री मंदिर के शान्त परिवेश में एक अनुपम शांति का अहसास होता | कृष्ण और राधारानी जी नित नए परिधानों में सुजज्जित किये जाते हैं | मंदिर के परिसर में एक बड़ा सा बरगद का पेड़ है जहां चलने वाली मंद -मंद वायु में एक अनूठा आकर्षण है | कहा जाता है की कृष्ण जी की प्रतिमा को अगर काफी देर एकटक देख देखने उन्हें नील रंग में परिवर्तित होते हुए देखा जा सकता है | और उनके अलौकिक सुंदर रूप का आभास होता है | कृष्ण जन्माष्टमी को भव्य झूलन का भी आयोजन किया जाता है |


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