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वर्ष: 2, अंक 36, मई(प्रथम), 2018



वसंत के रूप में संस्कारों का मोहक मेल


मोहन पांडेय


*विद्यापति की दृष्टि में महाकवि विद्यापति मिथिलांचल की मोहक धरा पर उत्पन्न ऐसे कवि हैं जिन्होंने हिंदी साहित्य को अपनी मोहक रचनाओं से समृद्ध किया। प्रेम व भक्ति का आनंद लेने के लिए पाठकों को बरबस ही आकर्षित होना पड़ा और आज भी हिंदी के पाठक उन्हें भूलने की गलती नहीं करते हैं। संस्कृत, अवहट्ट और मैथिली में की गई रचनाओं ने खासकर पूर्वी भारत को आनंदसागर में गोता में डुबकी लगाने के लिए मजबूर कर दिया। यह इसलिए संभव हो सका क्योंकि उन्होंने जनता की बोली को साहित्य सृजन का मूल आधार बनाया। पूरी तरह भक्ति के विचारों से ओतप्रोत विद्यापति ने अपनी रचनाओं में परमात्मा व प्रकृति से दूराव नहीं किया है। मैथिली में रचित पदावली में वर्णित कौतुक, अभिसार, बसंत, विरह, मे स्थापित भाव निश्चित रूप से सहृदय के अंतर्मन में अपनी गहरी छाप छोडते है। बसंत के आविर्भाव और उसके विविध प्रसंगों का वर्णन, भारतीय संस्कृति में प्रचलित संस्कारों को स्थापित करने का माध्यम और प्रकृति की कोमलता का सहज ही दर्शन होता है। बसंत के आगमन पर वे उसके जन्म का होना मानते हैं तभी तो लिखा कि मास में बसंत पंचमी पूर्णगर्भा हुई। नौ माह बीतने पर दुखी हुई तो वनस्पतियां धाय के रुप में उपस्थित हुई।

माघ मास सिरि पंचम गंजाईलि, नवम् मास हरुआई हे। अतिघन पीड़ा दुख बड़ पाओल, वनसपति भेलि धाई हे।।
कमल की पंखुड़ियों के मधु से भ्रमरो ने मधुपान कराया। **मधुलए मधुकर बालक, दएहलु पंखुरी लाई।।
तो बाल बसंत को पास में बैठी भ्रमरी पालने का गीत सुनाने लगी।।

और गणना में निपुण कोयल ने बालक का नाम भी बसंत रख दिया (कोकिल गनित गुनित भल जानए रिपु बसंत नाम थोला।।

और बादलों ने शिशु बसंत के आंखों में काजल लगा दिया। इससे स्पष्ट होता है कि विद्यापति संस्कारों को प्रकृति के साथ अटूट रुप से जोडने में सफल रहे।

प्रकृति के महान् सौंदर्य बसंत का ही असर है कि वृंदावन के वातावरण में नवीनता और मादकता प्रवाहित होती है "" नव वृंदावन नव नव तरुगन नव नव विकसित फूल। नवल बसंत नवल मलयानिल मातल नब अलि कूल।।

बसंत की सेना को देख शिशिर ऋतु की सेना भंग हो गई अर्थात महाकवि विद्यापति ने प्रकृति के सांगोपांग मनमोहक करने के प्रयास में पूरी तरह से सफलता प्राप्त की जिनसे मानव मन आह्लादित होता है


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