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वर्ष: 2, अंक 36, मई(प्रथम), 2018



बेटी का बाप


सुनीता त्यागी


आज पूरी बस्ती में एक ही चर्चा थी कि आज वो जेल से छूट कर बाहर रहा है । सारे मोहल्ले की महिलाएं भी घबरा रही थीं कि अब क्या होगा।

खबर यह सुन कर छोटी सी कोठरी में बैठी विमला चिन्तित हो गयीं।

और हों भी क्यों न! ।आज से सात वर्ष पहले विमला ने ही उस दरिंदे को ,उसकी नौं वर्ष की बेटी के साथ जबरन दुष्कर्म का प्रयास करते हुए रंगे हाथों पकड़ा था ।फिर चप्पल से पीटते हुए थाने ले गयी थी । और उसे सात साल की सजा हुई थी ।

आज वही व्याभिचारी वापस आ रहा है तो विमला के मन में भारी उठापटक चल रही है कि कैसे रहेंगी वो उसके साथ एक ही घर में ।

विमला इसी उधेड़ बुन में लगी थी कि कैसे रोके उसे घर में आने से, क्यों कि आज भी वो बलात्कारी ,कानून की नजर में विमला का पति और उसकी बेटी का बाप है।

कुछ दूरी पर बैठी बेटी ने माँ की मनोदशा को पहचान लिया और बडे आत्मविश्वास के साथ उठ कर उसने मां का चेहरा अपने हाथों में थाम लिया "डरो नहीं मां, आने दो उसे, अब हम दो नहीं ग्यारह हैं "..तभी दरवाजे की कुन्डी खड़क उठी, देखा सामने वही हैवान खडा़ था ।

बेटी को सामने पा कर उसने अपने पांव से चप्पल निकाल कर उसके हाथ में थमा दी और उसके चरणों में गिर गया " बेटी कानून तो मुझे सजा दे चुका है , पर मैं आज भी तेरा गुनहगार हूं। ले ये चप्पल और मुझे तब तक मार, जब तक कि मेरे भीतर का वो जानवर न मर जाये जो शराब के नशे में बाहर आ गया था।


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