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वर्ष: 2, अंक 36, मई(प्रथम), 2018



कद्रदान


कंचन अपराजिता


प्रदर्शनी लगी हुई हैं। विभिन्न आकर की मिट्टी से बनी कलाकृतियाँ अपनी अप्रतिम आभा लिए स्टॉल पर सजी हुई हैं।। सुंदर गुलदस्ते टेबल लैम्प ,छोटे बड़े खिलौने ,कई प्रकार के जानवर ,मुखौटे ,यहाँ तक की मिट्टी से बने जेवर लोगों के आकर्षण का केन्द्र बने हुये हैं।लोग इन समानो को देख कर उन बनानेवालों कलाकारों की तरीफ करते नहीं थक रहे हैं। तभी घोषणा हुई। कृपया सभी लोग मंच के पास आ जाए ।

सभी लोग मंच के पास एकत्रित हो गये।

"सबसे पहले बधाई देता हूँ इस प्रदर्शनी के सफलता के लिए प्रांजल को ... "

तभी एक २१ वर्ष की लड़की स्टेज पर चढ़ी।

"धन्यवाद आप सबों का । आप यहाँ आये, हमारे कला को सराहा । कलाकार को अपने सृजन से प्यार होता ही है पर प्रोत्साहनउसकी सृजनशीलता रूपी वृक्ष में उर्वरक का कार्य करती है ।"

"मैडम ,ये सभी जानना चाहते हैं कि आज जब अनेक युवा डाक्टर , इंजिनीयर बन रहे हैं आपने इस क्षेत्र को कैसे और क्यों चुना।"

"ये यात्रा उस समय शुरू हुई जब मैं चौदह की थी। उन दिनो एक कहानी पढ़ी थी जिसमे एक कन्या अपने भावी वर चुनने जा रहेपिता से कहती है कि वह ऐसे व्यक्ति से विवाह करेगी जो कोई एक हुनर जनता हो ।जब उसके पिता कहते हैं तुमने ये शर्त क्यों रखीतो वह कहती है कि जिसे कोई भी एक हुनर आता हो वो विपरीत परिस्थतियों मे भी अपने हुनर से रोजी रोटी कमा लेता है। इसकहानी पढ़ मुझे भी लगा व्यक्ति को कोई हुनर जरूर सीखना चाहिए। मेरे घर से कुछ दूरी पर कुम्हार टोली थी । जहाँ मैं पहुँच गई, देखा एक कुम्हार मिट्टी के बरतन बना रहे हैं फिर क्या मै प्रतिदिन जाकर काका के पास बैठ जाती ।"

"अरे वाह! आपकी कहानी तो बहुत रोचक हैं तो क्या यहाँ प्रदर्शनी मे लगे सारे मिट्टी की कलाकृतियाँ आपने बनाई हैं ?"

"नही मैने सोचा ये हुनर अन्य लोगों को भी सीखना चाहिये इसलिए मैंने बच्चों को सिखाना आरम्भ कर दिया। यहाँ पर सिर्फ़ मेरा हीनहीं उन सबों का हुनर आप देख रहे है।"

"आइये अब अपने काका से मिलाती हूँ जिन्होंने मुझे ये कला सिखायीं ।"

वो नीचे जाकर एक बुज़ुर्ग को मंच पर लाने लगीं। करतल ध्वनि दूर तक सुनायी दे रही हैं ।


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