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वर्ष: 2, अंक 36, मई(प्रथम), 2018



ज़िंदगी में मुस्कुराना चाहिए!


धर्मेन्द्र अरोड़ा "मुसाफ़िर"


 
ज़िंदगी में मुस्कुराना चाहिए!
दिलनशीं नगमे सुनाना चाहिए!!

कामयाबी की तमन्ना है अगर!
हौंसला अपना बढ़ाना चाहिए!!

दूसरों को जो समझते कुछ नहीं!
आइना उनको दिखाना चाहिए!!

शायरी का फ़न कहाँ आसान है! 
सीखने को इक ज़माना चाहिए!!

जब मुसाफ़िर हो अँधेरा हर तरफ़!
आस का सूरज उगाना चाहिए!!

	 
 

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