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वर्ष: 1, अंक 12, मई(प्रथम)2017



पलक पांवडे़ बिछाकर इंतजार पटरी होस्टेस का

सुदर्शन कुमार सोनी


   अधिकांश रेलयात्री रेल के सफर को एक सफरिंग मानते है , इसके पीछे के कारण बहुत से है ? आरक्षण नही मिलना या यदि मिल गया आरएसी वाला जिसमे दो लोगो का एक बर्थ पर रात भर एक दूसरे का थोबडा़ पसंद न होते हुये भी मुस्कराते हुये एक दूसरे को दोस्त समझना , जो लेकिन यदि रात की यात्रा है तो घंटे दो घंटे मे दूसरे से ज्यादा जगह हथियाने की जुगत मे धक्का मुक्की करने से दुश्मन मानने मे तब्दील हो जाती है। कभी कभी आधी रात को इसके गंभीर बहस मे तब्दील होने की भी पूरी संभावना विद्यमान रहती है ?

  कभी पानी खत्म हो जाना एैन उस मौके पर जब कि आपने शेव करने की क्रीम गालो मे लगा रखी हो या आप टायलेट मे हल्के हो चुके हो और पानी गायब होने से एकदम से भारी हो गये हो या टाॅयलेट मे टिश्यु पेपर न होने का ध्यान तब आना जब फारिग हो चुके हों ? एैसा नही है कि टिश्यु पेपर इश्यु नही हुआ होगा बीच मे कंही और की यात्रा पर चला दिया गया होगा ? एसी तेज गर्मी मे अचानक जबाब दे जाये या तेज सर्दी मे एसी की कूलिंग इतनी ज्यादा हो जाये कि कंपकंपी छूटने लगे और चार घंटे से लगातार शिकायत के बाद भी कूलिंग कम न हो रही हो ? या आपको गंदे व दागदार चादर तकिये दे दिये गये हों , गर्म पानी जैसी चाय यह तो रेलयात्री का अहोभाग्य है ! आपकी आरक्षित बर्थ पर कोई और कब्जा जमा ले या अप डाऊनर के कारण आरक्षित कोच जनरल से बदतर हो जाये ? सैकडो़ तरह की सफरिंग है जो कि आप रेलसफर के दौरान झेलने अभिशप्त हैं और इस सबसे बडी की टीटीई व अटेंडेंट कभी अच्छे से बात करने वाले नही मिलते , यदि मिल जाये तो आपको लगे कि आप कोई स्वप्न देख रहे हों ?

  और यदि इसकी हवाई यात्रा से तुलना करो तो कितना व्यवस्थित रहता है वहां सब ! यदि आपकी सीट खिड़की की ओर है तो आप उसी मे बैठेंगे , बीच की है तो बीच मे ही इस बीच को किनारा न समझे , भले ही दोनो ओर की खाली हों ! ज्यादा चबड़ चबड़ भी सह यात्री से नही करते । वहां रेल मे तो आपको आवंटित नीचे की सीट मे कोई पहले से ही पसर कर अपना मालिकाना हक बनाने की कोशिश करता मिल जाता है। हवाई जहाज का टॉयलेट एैसा कि घर के भी टॉयलेट को साफ सफाई मे मात करे ! और इस सबसे बडी बात कि घडी़ घडी़ एयरहोस्टेस के रूप मे कोई न कोई शोख जवां हसीना आपकी छोटी छोटी बातो का ध्यान रखने चेहरे पर बत्तीस इंच की मुस्कान के साथ हाजिर होती रहती है ! कितने सलीके से वह हर चीज पेश करती है पानी , चाय , काफी जरा सी आपकी पुकार पर दौडी़ चली आती है । और यहां रेल मे खूसटो से पाला पड़ता है सहयात्री भी , टीटीई भी , अटेंडेंट भी सबके सब खूसटो की मंडली होती है यहां ! कोई लगेज के लिये जगह न बचने से किसी सहयात्री से बहस कर रहा है , तो कोई नीचे की बर्थ के जुगाड़़ मे सफलता न मिलने से उस यात्री को नसीहत देने की कोशिश कर रहा है तो कोई आपके अखबार या पत्रिका मे गिद्व दृष्टि गडा़ये है ? तो कोई खर्राटे लेकर नींद मे खलल डाल रहा हों।

  इतने सालो मे रेलो मे कुछ भी तो नही बदला है , हम रेल यात्री भी कल्पना ही करते रहे है उसी निर्वचनीय सुख को पाने की जो कि हवाई यात्रियो के नसीब मे हमेशा से लिखी है , और किसी का नसीब लिखना तो प्रभु का ही काम है ? और किसकी बिसात है कि किसी का नसीब बदल सकें। लगता है कि भगवन ने , रेलो के ’प्रभु’ ने हम रेलयात्रियो की सुन ली है। रेल बजट की घोषणा कि रेलो मे भी हवाई जहाज की ’एयर होस्टेस’ की तर्ज पर ’रेल होस्टेस’ तैनात की जायेंगी । क्या सुंदर विचार है प्रभु का , प्रभु के अलावा कोई और यह कर भी नही सकता ? प्रभु अंर्तयामी है इसीलिये तो यह संभव हुआ
है !

  हमारे जैसे करोडो़ जो कि आज तक हवाई यात्रा नही कर सके है , इसकी कल्पना मे डूबे है कि वो घडी़ कैसी होगी जब हाथ मे इमपोर्टेड घडी़ बांधे , डिजायनर कपडे़ पहने , छरहरी , लम्बी , दमकती , गालो मे रूज , गले मे रूमाल बांधे गजब की शोख हसीना ’रेल होस्टेस’ हर कोच मे मुस्कराती यहां से वहां विचरण करती चाहे सामान्य ट्रेन हो या कि तीर्थ दर्शन , भारत दर्शन कराने वाली हो अपने दर्शन लाभ यात्रियो को कराती दिखेगी ! यात्री जैसे ही अपने कोच के पास अपना लगेज लेकर आयेंगे कि वह मुस्करा कर स्वागत करेगी और लगेज उठाने मे और उसे रखवाने मे मुस्कराहट व कातिल अदा के साथ अपना सहयोगी रोल अदा करेगी । उसकी कातिलाना मुस्कान कंही हमे घायल न कर दें यह सोच कर ही मन मे गुदगुदी पर गुदगुदी उठ रही है ! एक बार जब सारे यात्री अपनी अपनी सीटो पर बैठ जायेंगे तो वह आकर देखेगी कि सभी का सामान व्यवस्थित रखा है कि नही , फिर वह मुस्करा कर कोच के बीचो बीच जायेगी और सुरक्षा संबंधी निर्देशों का लाईव डेमो देगी । एक कोच मे प्रभु कम से कम दो ’रेल होस्टेस’ रखेंगे तो यह न्याय की बात होगी , नही तो एक ही होने से वह जिस ओर नही है वहां के यात्रियो के साथ यह अन्याय होगा । आप तो अंर्तयामी है ,, हमारी भावनाओ की आप हमेशा से कद्र करते आये है। और प्रभु इनकी कोई निश्चित युनिफार्म मत निर्धारित कर दीजियेगा , महाराजा मे जैसे साडी़ का बंधन है , नही तो सब गडबड़ हो जायेगा । जिसको जो पहनना हो उसकी स्वतंत्रता रखना और जिसको जो देखना हो उसकी भी तो आजादी है ही ! पहनने और देखने की आजादी का जमाना है यदि दोष है तो देखने वाले की नजरो मे हैं। यह मीडिया तो चिल्लायेगा ही , इसका काम ही है एैब ढूंढ़ना यदि आपने साडी़ निर्धारित कर दी तो आलोचना करेगा । कुछ निर्धारित नही की तो आलोचना करेगा। इसलिये इसकी परवाह न कर प्रभु के भक्त यानि यात्री की परवाह प्रभु करें। और आपने यह इतना बडा़ कदम उठाया है कि देश मे चल रही पन्द्रह हजार से अधिक ट्रेनों मे सभी मे यदि एक दिन ’पटरी होस्टेस’ नियुक्त हो गयी तो कितनी महिलाओ को रोजगार मिल जायेगा ? सोचे जो काम कोई नही कर पाया है आप ने एक झटके मे कर डाला ! आठ मार्च को तो आपका अभिनंदन होना चाहिये।

  और कितना अच्छा लगेगा कि लम्बी दूरी की ट्रेनों मे होस्टेस के लिये भी अलग केबिन होगा , उनके मेकअप के लिये भी आर्टिस्ट होगा तो यह अतिरिक्त रोजगार सृजन होगा। इसका एक और पाजीटिव साईड इफेक्ट होगा अभी यात्री कैसे भी रेल मे चले आते है कोई नाडा़ बाहर लटक रहे पाजामे मे , तो कोई लुंगी बनियान मे , तो कोई बिना नहाये , लेकिन अब उन पर भी कुछ न कुछ असर होगा और वे भी बन संवर कर आयेंगे आखिर हसीन रेल होस्टेस पर भी तो इम्प्रेशन जमाना कईयो का मुख्य शगल होगा।

  अभी रेल्वेज को केवल पच्चीस प्रतिशत आय यात्री किराये से होती है ’रेल होस्टेस’ सेवा के आ जाने के बाद ट्रेनें ठसाठस भरी रहेंगी । जो लोग कभी बिना आरक्षण के नही चलते वे पायदान पर लटक कर भी एैसी ट्रेनों मे यात्रा करने से परहेज नही करेंगे । दो साल मे ही रेल की आय यात्री किराया मद मे पचास प्रतिशत हो जायेगी ? जो काम कोई नही कर पाया वह इस एक कदम से हो जायेगा इस स्टेप को ’गे्रट लीप फारवर्ड’ कहना गलत नही होगा। यदि किसी रूट मे ट्रेन मे यात्री कम आ रहें हो तो यहां सबसे पहले आप इनकी तैनाती कर दें , घाटे वाली ट्रेन मोटा मुनाफा पतली व कमसिन रेल होस्टेस की बदौलत देने लगेंगी ! हां रेल मजनुओ की एक नयी समस्या भविष्य मे खडी़ होगी जो स्टेशनों के आसपास वैसे ही जैसे कुछ मजनूं गल्र्स कालेज के आसपास मंडराते है नयनसुख के लिये मंडराते मिल जायेंगे । ंजब यह होगा तब इसका भी समाधान आप निकाल ही लेंगे । क्या ेकरियेगा देश मे बेरोजगारी इतनी ज्यादा है ! नही तो अपने योगी आदित्यनाथ जी को रोमियो स्कवाड का आयडिया कब काम आयेगा !

  जब स्टेशन मे परिचारिकाओ की टीम बन ठन कर अपने सूटकेस स्लाईड करते हुये अपनी टेªन की ओर आयेगी तो प्लेटफार्म पर जो यात्री जंहा है वहीं थम जायेगा ! कर्फ्यू जैसा दृष्य शुरू शुरू मे बनेगा खोमचे वाले चिल्लाना बंद कर देंगे , प्रभु आपकी लीला अपरंपार है । एक और लाभ है रेल्वेज एक आदमी जिसे ’रेल यात्री; कहते है से बेदम परेशान रहती है। यह गंदा आदमी पूरी रेल को पूरे सफर मे गंदा करता रहता है कंही भी मुंह से पिच कर देगा , टायलेट गंदा करके आ जायेगा , कैसे भी टांग फैला कर पसरा रहता है , मूँगफली खायेगा तो छिलके वहीं फेंक देगा फिर सफाई न होने की शिकायत भी बेशर्मी से करता है । इसकी एक एक हरकत मे फूहड़पन के दर्शन होते है। ’रेल होस्टेस’ की उपस्थिति मे यह सभ्यता से पेशआने मजबूर हो जायेगा। यात्री तो चाहते है कि आप टीटीई और अटेंडेंट का काम भी इन्ही को सौंप दे ? एक कोच मे दो नही चार रेल होस्टेस हो जाये तो बाहर का मौसम कितना भी खराब हो अंदर कितना सुहाना रहेगा , हम तो कल्पना करके ही गुदगुदा रहे है ! गंगू का तो मानना है कि यह एक कदम यात्रियो के असभ्य व फूहड़ आचरण को बेदम कर देगा !

  अंत मे प्रभु , रेल के सफर को सफरिंग से मुक्त कर निकट भविष्य मे सुहावना व हसीन बनाये जाने की विजनरी योजना हेतु आपको कोटि कोटि धन्यवाद । आपके इस एक कदम से ही रेल्वेज का सितारा बहुत जल्दी आसमान मे चमकेगा !

   हम बहुसंख्य यात्री पलक पांवडे़ बिछाकर ’पटरी होस्टेस’ का इंतजार कर रहे है ! प्रभु निर्णय बदल मत देना तुरन्त ही लागू करवा देना , यह कदम भी टिवटर खाते की तरह काफी परिणाममूलक होगा। और केवल शताब्दी , राजधानी , दूरंतो आदि तक ही इसे सीमित नही रखना इसका विस्तार तुरंतो सभी ट्रेनों मे कर देना।

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