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वर्ष: 1, अंक 12, मई(प्रथम)2017



मूर्खता से लाभ

राजेन्द्र वर्मा


   मूर्खता प्रकृति का वरदान है। यह हर किसी पर कृपालु नहीं होती। लेकिन जिस पर अपनी कृपादृष्टि फेंकती है, वह सदा-सदा के लिए सुखी हो जाता है। अपनी छोड़ उसे किसी और की चिंता नहीं सताती— देश और देशवासी तो दूर की बात है। तुलसी बाबा ने पहले ही कहा— “सबसे सुखी हैं मूढ़, जिन्हें न व्यापत जगत गति।”

  लोकतंत्र में ‘बहुमत’ की धुरी पर लोकतंत्र टिकता है। बहुमत की फ़सल मूर्खता के खेत में उगती है। इसलिए बहुलांशों को अशिक्षित बनाये रखने की अपनी प्राचीन परंपरा है। लोगों के पढ़-लिख जाने से अनेक समस्याएं उपजती हैं, जिनमें से सबसे बड़ी समस्या यह है कि पढ़े-लिखे लोग न तो अपनी मूर्खता छोड़ते हैं और न ही उसे ज़ाहिर होने देते हैं। इसलिए वे हमेशा दुखी रहते हैं। मोलियर नामक विदेशी विचारक कहा करता था कि पढ़ा-लिखा मूर्ख अज्ञानी से कहीं अधिक मूर्ख होता है। इससे यह तो सिद्ध हुआ कि मूर्खता विश्वव्यापी फेनोमेना है। इसलिए मूर्खता को लेकर सरकार निश्चिन्त है | तभी तो अपने यहाँ अभी भी पढ़े-लिखों की संख्या एक चौथाई से अधिक नहीं है, अक्षरज्ञान वालों को भी मिला लें, तो यह आंकड़ा भले ही एक बटे दो हो जाए !

   मूर्खता के पुण्य प्रभाव से मतदाता किसी पार्टी के घोषणापत्र पर नज़र नहीं डालता— फलाने के कहने पर फलाने को वोट दे देता है ! सत्ता की भूखी पार्टियाँ रोज़गार देने के बजाय लैपटॉप बांटती है, अयोध्या में राम-मंदिर बनवाने और किसानों के क़र्ज़ माफ़ करने का वायदा करती है, लेकिन मतदाता अपने को मूर्ख नहीं मानता। इसलिए जनादेश से नहायी सत्तासीन पार्टी मतदाताओं की मूर्खता का नक़दीकरण कराती है। यह मूर्खता ही है जो बहुमत का चोला पहनकर संसद या विधानसभा में कानून-व्यवस्था और विकास आदि का क़ानून पास करती है। बहुमत तय करता है कि बुद्धिमत्ता और मूर्खता में कौन बड़ा है। हाल ही में तमिलनाडु के जलिकुट्टू को सुप्रीम कोर्ट ने ग़लत बताया, लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय लागू किया जाता, तो देसी वोट बैंक ही जलिकुट्टू हो जाता, इसलिए जलिकुट्टू को विधानसभा में हाँक दिया गया और उसने वहां सुप्रीम कोर्ट की भावना को रौंदते हुए भारी बहुमत से जीत हासिल की। अब पराजित पक्ष चाहे तो पुनः कोर्ट जाए और जलिकुट्टू क़ानून को ख़ारिज कराए! सुप्रीम कोर्ट अगर यह कानून ख़ारिज करता है, तो फिर देखेंगे।.... बहुमत ने अपना काम किया और सीना ठोंक कर किया। अब इसे क्या कहेंगे— बुद्धिमानी या मूर्खता?

   बहुमत और मूर्खता में ख़ूब सधी-बधी रहती है, इसीलिए पंचायत बहुमत के आधार पर सामूहिक बलात्कारियों को बाइज्जत बरी कर देती है। उसे ऐसा इसलिए भी करना पड़ता है क्योंकि हर बलात्कारी दबंग, मजबूत राजनैतिक जड़ों या पैसेवाले सम्मानित परिवार का होता है। हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में भी बहुमत अपना रंग दिखाता रहता है। जब किसी मुद्दे पर डिवीजन बेंच एकमत नहीं होती, तो ‘लार्जर बेंच’ बनायी जाती है, जो बहुमत से निर्णय देती है। ऐसे निर्णय में कितनी बुद्धिमत्ता और मूर्खता है, कहना कठिन है।

   एक समय में बुद्धिमानों की चौपाल में गधे को गधा कहना मूर्खता माना जाता था, लेकिन अब इसे बुद्धिमानी मानी जाती है। चुनावी भाषणों में तो अब प्रधानमन्त्री तक के नेता गधे-पुराण के पाठ में लिप्त पाये जाते हैं। गधे पहले मूर्खता का विरोध नहीं करते थे, पर अब अगर उन्हें कोई गधा कहे, तो वे बुरा मानते हैं। श्रीलाल शुक्ल जी ने एक व्यंग्य लिखा था- ‘मम्मी जी का गधा’। उसमें भी एक अमीर माँ-बाप के बेटे को यही शिकायत थी कि मम्मी अगर बेटे को गधा कहें, तो कहें, दूसरे कैसे कह सकते हैं? लेकिन बेचारे गधे की तकलीफ किसी ने नहीं सुनी। मूर्खता का भरपूर आनंद लेने वाला ही बुद्धिमान कहलाता है।

  ऐसा नहीं कि मूर्खता केवल आदमियों में ही पायी जाती हो, पशुओं में भी इसके खूब उदाहरण मिलते हैं। यों, कुत्ता मूर्ख पशु की श्रेणी में नहीं आता, वह पुलिस और मिलिट्री की शानदार नौकरी करता है और देशप्रेम भी भौंकता है, लेकिन जब वह सड़कों और गलियों में घूम-घूमकर जीवनयापन करता है, तो वह भी मूर्खता का प्रदर्शन करता है— सूखे हाँड़ पर ज़बान रगड़-रगड़ वह अपने ही खून का स्वाद आँखें मूंदकर लेता रहता है। बाद में जब उसकी छिली जुबान दर्द करे, तो भले ही पछताये।... श्रीमान बैल, इसलिए बैल कहलाते हैं कि वे रूखा-सूखा खाकर भी शोषण की चक्की में पिसते हुए अपनी वफ़ादारी नहीं छोड़ते । हर बैल पहले सांड होता है और इसलिए वह शंकर के नंदी की तरह पूजा जाता है। सेंसेक्स की दुनिया में भी उसकी बड़ी धाक है। लेकिन जब से वह बैल बनता है, तो सौ मुसीबतें घेर लेती हैं। भला हो ट्रेक्टर कंपनियों का कि जिन्होंने गाँव-गाँव इतने ट्रेक्टर पहुंचाये कि बैलों और बछड़ों को बूचडखाने की शरण में जाना पड़ा, वर्ना किसानों के द्वार पर तो जीना ही मुहाल हो गया था !

   मूर्खता की एक उत्तरआधुनिक कथा का आनंद लीजिए। भारतवर्ष के उत्कर्ष काल में पञ्चवर्षीय विद्याभ्यास के बाद मृतकों को पुनर्जीवित करने की चार डॉक्टर डिग्री लेकर घर लौट रहे थे। रास्ते में जंगल पड़ा, जहाँ एक प्राणविहीन शेर पार्थिव शरीर के साथ पड़ा था। डॉक्टरों ने सोचा कि क्यों न सीखी हुए विद्या की परीक्षा ली जाए! जिस विश्वविद्यालय से उन्होंने डिग्री ली थी, उसका कुलपति अपनी बेटी के विवाह में बहुत व्यस्त था। इस कारण वह डॉक्टरों की परीक्षा न ले सका था और आनन-फानन में उसे दीक्षांत समारोह आयोजित कर डिग्री बंटवानी पड़ी थीं। हालाँकि कुछ लोगों को इस कार्यक्रम पर ऐतराज़ था, लेकिन उन नादानों को कौन समझाये कि जब डिग्री बांटनी ही है, तो चाहे उसे परीक्षा लेकर बांटी जाए या बिना परीक्षा के— क्या फ़र्क पड़ता है ? बहरहाल, चारों डॉक्टरों ने मृत शेर पर अपनी विद्या आज़मायी और वह जीवित हो उठा! इससे सिद्ध हो गया था कि विश्वविद्यालय में पढ़ाई अव्वल दर्ज़े की होती है। यह बात और है कि शेर उन चारों को शेर खा गया।

  सरकारी दफ्तर में दो कहावतें मशहूर हैं— बने रहो पगला। काम करे अगला।। अथवा, बने रहे लुल। मौज करो फुल।। इन कहावतों की ख़ासियत यह है कि इन पर मूर्ख और बुद्धिमान, दोनों साथ-साथ अमल कर सकते हैं। इससे यह संकट दूर हो गया कि किसे पगला या लुल कहा जाए और किसे अक्लमंद?

  मूर्खता का सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व है। विवाह आदि समारोहों में चन्द घंटों के प्रदर्शन के लिए लाखों- करोड़ों रुपये स्वाहा होते हैं, वरना बारातियों और जनातियों में कौन किसको नहीं जानता? किसने क्या-क्या बेच कहाँ-कहाँ से क्या-क्या जुटाया? उनको खाना खिलाया जाता है, जो पहले ही से खाये-अघाये हैं! क्या किसी बारात में ग़रीबों और भिखारियों को खाना खिलाया जाता है? दीवाली में करोड़ों रुपयों के पटाखे प्रदूषण बढ़ाने के लिए फोड़े जाते हैं ताकि एक-दूसरे की ख़ुशी धुआँ हो सके। होली में रंग, कीचड़ और गोबर से कपड़े ख़राब करना आखिर क्या है? मन्दिर का घंटा हो या फिर, अखंड रामायण, माता की चौकी, सत्य साईं का कीर्तन हो अथवा, मस्जिद की अजान हो, या मजलिस का आयोजन— किसी का काम लाउडस्पीकर के बिना नहीं चलता! जब तक दूसरों की नीद हराम न कर दी जाए, भगवान या अल्लाह मियाँ को चैन न पड़ेगी ! किसी की मारकर खा जाना मनुष्यता की निशानी न होती, तो भला कोई बकरा क्यों काटता? इसीलिए न कि ‘अल्ला को प्यारी है क़ुर्बानी!’ पान-मसाला और सिगरेट पर यदि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होतीं, तो भला करुणा के सागर सेठ लोग उन्हें क्यों बनाते और बिकवाते? उनकी रसोई में लहसुन-प्याज़ भी नहीं आता। कोई अगर अपनी मूर्खता नहीं छोड़ना चाहता है, तो अगला मूर्खता से क्यों न मालामाल हो? शराब का विज्ञापन सोडा वाटर से हो रहा है। चोरी जुर्म होगी, हेरा-फेरी थोड़े ही है! अगर हैं भी, तो साबित करो! दिन-रात टी.वी. की बहसें सुनते-सुनते ठुल्लू बन जाइए ! मंदिरों में पत्थरों को कलाकंद और सी घी के लड्डुओं का भोग और दानपात्र में ठुंसे सैकड़ों नोट, लेकिन ज़रूरतमंदों की हथेलियों पर एक-दो रुपये के सिक्के ! हे मूर्खता महारानी ! कहाँ है आपके चरण ?

   मूर्खता को हेय भले समझा जाए, पर इसके कई लाभ हैं। पहला लाभ तो यह है कि मूर्ख को अपमानित नहीं किया जा सकता और न ही उस पर व्यंग्य किया जा सकता है। चूंकि मूर्ख को समझाया नहीं जा सकता, इसलिए उसे समझाने में होने वाले समय को नष्ट होने से बचाया जा सकता है। तीसरा लाभ यह है कि मूर्ख अपराध नहीं कर सकता। अतः वह एक स्वस्थ समाज की रचना में सहायक होता है। वैवाहिक स्थिति में वह बच्चे अधिक अवश्य उत्पन्न कर देता है, लेकिन इससे लाभ यह है कि भारत जैसे गरीब देश में काम करने वाले हाथ बढ़ते हैं जो आगे चलकर विदेशों में कमाई कर देश को फोरेक्स से मालामाल कर देते हैं। इस प्रकार, वे देश का नाम भी विदेशों में ऊँचा करते हैं। सबसे बड़ा तो यह कि यदि मूर्ख न हों, तो बुद्धिमानों की पहचान का संकट उत्पन्न हो जाए! बल्कि उनका अस्तित्त्व ही खतरे में पड़ जाए। इसलिए मूर्ख को अब उसकी श्रेष्ठता के अनुसार मूर्खश्री, मूर्खश्रेष्ठ, मूर्खभूषण, मूर्खविभूषण आदि अलंकरणों से विभूषित करने की महती आवश्यकता है।

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