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वर्ष: 1, अंक 12, मई(प्रथम)2017



हौसला

मनोरंजन तिवारी


   यूँ तो गाँव के लोग बहुत खुल कर हँसने, बोलने और जीने के लिए जाने जाते है, पर उसी गाँव में कुछ ऐसे लोग भी होते है जिनके चेहरे पर मुस्कुराहट बमुश्किल ही आ पाती है।जानार्दन पाल ऐसे ही सीरत का आदमी है। उसे बचपन से देखता आ रहा हूँ, कभी उसे मुस्कुराते हुए ना देखा। गरीबी, लचारी और स्वाभिमान ये सब मिल कर शायद किसी भी शख्स के चेहरे की मुस्कराहट छीन सकते है। जनार्दन बहुत गरीब है, पर कभी सुनने में नहीं आया की उसने किसी से कुछ माँगा हो या चुराया हो। जवानी के दिनों में उसके एक हूनर की सर्वत्र चर्चा होती थी, वह आल्हा-उदल की कहानी को ढोलक पर थाप देकर इतने रोमांचक तरीके से गाता था की सुनने वालों में सचमुच वीररस हिलोरें मरने लगता था। तब वह जवान था, मगर तीन कुँवारी बहनों की शादी के जिम्मेवारी के एहसास ने उसे मूक बना दिया था। वह पुरे दिन मजदूरी करता फिर अपने बकरियों के लिए चारा लाता और आठ-नौ बजे( जब गाँव के बहुत सारे लोग सोने लगते) गाँव के बाहर, एक बांस और फ़ूस के बने झोपड़ी में अपना ढोलक निकाल कर शुरू करता था आल्हा-उदल का गान। गाँव के काफी लोग जिन्हें संगीत से प्यार था आ जाते थे। मगर इस गायन से उसको कुछ भी प्राप्त नहीं होता था

  न वह किसी से कुछ माँगता था ना कोई उसे कुछ देता था। एक बार बनारस से एक प्रोफ़ेसर साहब आए थे, जब उन्होंने उसे गाते हुए सुना और ढोलक पर पड़ कर जादू कर देने वाली अँगुलियों का कमल देखे तो आश्चर्य का ठिकाना ना रहा। पुछे, मेरे साथ बनारस चलोगे? जनार्दन को जैसे मनचाही मुराद पूरी हो गई, तुरंत तैयार हो गया। जनार्दन ने तमाम मुसीबतों के बाबजूद जितनी निष्ठा से, लगन से और परिश्रम से अपनी कला से प्यार करते रहा था, उसी कला ने उसकी जिंदगी बदल दी। काफी अरसे के बाद मिला मुझे। घर- परिवार का हाल पूछा फिर बताया तीन लड़कियाँ है उसकी और उन लड़कियों से मिल कर मुझे ऐसा एहसास हुआ की जनार्दन ने अपनी बेटियों में भी वही हौसला और लगन भर दिया है जो उसमें थी। जनार्दन की तीनों बेटियां स्कुल से आने के बाद घर का काम, मवेशियों को चारा देना और खेत-खलिहान के सारे काम करने के बाद देर रात तक लालटेन की रोशनी में पढ़ती हुई दिख जाती है।@मनोरंजन

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