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वर्ष: 1, अंक 12, मई(प्रथम) 2017



तुम्हीं तो नहीं चोट खाये हुए

पुरु मालव

तुम्हीं तो नहीं चोट खाये हुए
ज़हाँ से सभी हैं  सताये हुए।
 
चले  आये फिर मुँह उठाये हुए
ये ग़म भी हैं शायद सताये हुए  ।
 
चलो देख लेते हैं दिल का ज़ुनून
ज़माना हुआ आजमाये हुए। 
 
कभी दश्त की धूप में तन जला
कभी तेरी ज़ुल्फों के साये हुए 
 
कहाँ रास्ते ? मंज़िलें हैं किधर
कहाँ चल दिये सर उठाये हुए। 
 
कभी ग़ैर भी अपने बनके रहे
कभी अपने ही सब पराये हुए।
 
कहाँ उड़ चले मेरे सपनों की भाँति
ये बादल अभी तो थे छाये हुए। 
 
ख़ुशी में  रहे खोये-खोये से हम
मगर ग़म में हैं  मुस्कुराये हुए।
 
ये दरिया कहीं सूख जाये न "पुरु"
					कुछ आँसू तो रखना बचाये हुए।                                          
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