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वर्ष: 1, अंक 12, मई(प्रथम) 2017



मुश्किलों ने सर उठाये भी बहुत

पुरु मालव

मुश्किलों ने सर उठाये भी बहुत
हौसले फिर काम आये भी बहुत
 
दूरियाँ हर हाल में क़ाइम रही 
हम  यक़ीनन पास आये भी बहुत।
 
तल्खियाँ मौजूद थी  अपनी जगह
लोग मिलकर  मुस्कुराये भी बहुत
 
हंसना  छोड़ा तो  नहीं हालांकि यूँ
जिन्दगी में ग़म उठाये भी बहुत
 
मुद्दतों से याद आये भी नहीं
		याद जब आये तो आये भी बहुत                   
 
ज़िंदगी में मुश्किलें तो कम न थी
रास्ते हमने बनाये भी बहुत
 
न गिरी इक बूँद भी धरती पे "पुरु"
आसमां पर अब्र छाये भी बहुत

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