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वर्ष: 1, अंक 12, मई(प्रथम) 2017



दिन गुजरने दो, शाम ढलने दो

पुरु मालव

दिन गुजरने दो, शाम ढलने दो
आग कुछ और दिल में जलने दो
 
वक़्त का क्या, ठहर गया होगा
पर मुझे तो यहाँ से चलने दो।
 
देख- सुन ली  बहुत हकीकत अब
ख्वाब आँखों में कोई पलने दो
 
शाम की इन उदासियों को फिर
बामे-दिल पर ज़रा टहलने दो
 
यूँ जलाओ न दिल फक़त इससे
कोई चिंगारी भी निकलने दो
 
खिड़कियाँ खोल भी दो दिल की "पुरु"
रंगे -मौसम ज़रा बदलने दो
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