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वर्ष: 1, अंक 12, मई(प्रथम) 2017



इसी लिए तो मुस्कराता हूँ मैं,

डॉ० अनिल चड्डा

इसी लिए तो मुस्कराता हूँ मैं,
दर्द उनका पास बुलाता हूँ मैं।

शमा जले न जले अंधेरों में कभी,
दिल अपना खूब जलाता हूँ मैं।

कोई अफसाना नहीं, कहानी नहीं,
बस दिल का हाल सुनाता हूँ मैं।

बड़े जख्म दिए जमाने ने मुझे,
उन्ही को तो आज दिखाता हूँ मैं।

‘अनिल’ न यूँ  मायूस होगा कभी,
समां साथअपने ही  बिताता हूँ मैं।
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