Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 33,  मार्च(द्वितीय), 2018



कला और कलाबाजी


राजेन्द्र वर्मा


कला साधना माँगती है लेकिन आज किसी के पास समय नहीं है, वह जल्द-से-जल्द दुनिया में छा जाना चाहता है । सफलता का शॉर्टकट नहीं होता, इसलिए जल्दबाजी में पड़ा आदमी कला के बजाय कलाबाजी सीखता है । फिर वह लोकलुभावनी डुगडुगी से मजमा इकट्ठा करता है ताकि कलाबाजी का प्रदर्शन कर सके । सफल प्रदर्शन पर तालियाँ पिटती ही हैं, वह चाहे कला का प्रदर्शन हो या, कलाबाजी का । बल्कि, आज कलाबाजी पर अधिक तालियाँ पिटती हैं । तालियों की दरकार तो कलाकार को भी है, फिर कलाबाज को क्यों न हो ?

साहित्य, संस्कृति और राजनीति के क्षेत्र में कला के साथ ही कलाबाजी की सतत उपस्थिति रही है, लेकिन अब वह देश की आर्थिकी में भी घुस गयी है । नतीज़ा सामने है । इधर जी.डी.पी. के आँकड़ों की मुस्की पर सेंसेक्स का साँड़ नथुने फुलाता रहता है और उधर ‘विश्व आर्थिक फ़ोरम’ ऐसा आईना दिखाता है कि हम पाकिस्तान-तो-पाकिस्तान, नेपाल से भी नीचे चले जाते हैं ! बटखरा चाहे लाइफ स्टाइल का हो, प्रति व्यक्ति क़र्ज़ का हो अथवा पर्यावरण का— हम कहीं नहीं ठहर पाते । बालू पर जमे पैरों को उखड़ने में कितनी देर लगती है ! अस्सी देशों की सूची में पिछले साल हम साठवें पायदान पर थे, इस साल बासठवें पर है । इससे यह तो साबित हुआ कि हम गतिशील हैं, भले गति ऋणात्मक हो गयी ! सत्ता का कलाबाज उवाचता है कि ऋण-धन तो प्रभु की लीलाएँ है; उसकी माया की छायाएँ हैं— दिन के तीन पनों की तरह ! घटना-बढ़ना उनकी नियति है । हम कर्मों में विश्वास रखते हैं, नियति में नहीं; फल की इच्छा ही नहीं करते । हम योगिराज कृष्ण के वंशज हैं; गीता को आत्मसात किया है ।... सत्तर वर्षों से हमने घास नहीं छीली है, खदानों से सोना निकाला है; माटी से सोना उगाया है और राजनीति से सोना उपजाया है ! देश में अगर विकास नहीं हुआ, तो क्या दसियों बिलेनियर्स हवा में पैदा हो गये ?

राजनीति के अलावा फ़िल्म वह क्षेत्र है जहाँ कलाबाजी का बहुत स्कोप है । फ़िल्म यों तो कला-संस्कृति का हिस्सा रही है, लेकिन आज वह कला-संस्कृति के सिर चढ़कर अपना जलवा बिखेरती है । टी.वी. पर चौबीसों घंटे तैनात मुम्बइया और हिन्दी में डब दक्षिण-भारतीय फ़िल्में कलाबाजी का पाठ पढ़ा रही हैं और उत्तर-दक्षिण की संस्कृतियों को एकमेक कर रही हैं । पूरब और पच्छिम की संस्कृतियाँ तो पहले ही एकमेक हो चुकी हैं ! यों अपने यहाँ एक सेंसर बोर्ड भी है, लेकिन वह बेचारा प्रमाणन के अतिरिक्त कर ही क्या सकता है ! बहुत-से-बहुत ‘यू’ सर्टिफिकेट को ‘यू बटे अ’ कर दे । हाल ही में उसने तीन सौ करोड़ की लागत से बनी ऐतिहासिक फ़िल्म के नाम में संशोधन कर अपनी सशक्त भूमिका अदा की, क्योंकि फ़िल्म ने डिस्क्लेमर दिया था कि वह इतिहास की नहीं, कल्पना की खोज है । फ़िल्म में जब इतिहास घुसता है, तो वह ऐतिहासिक हो ही जाती है । संभावित दर्शक सीरियस हो जाते हैं और इतिहास की रक्षा के लिए नया इतिहास रचने लगते हैं । इस इतिहास-रचना में वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की भी परवाह नहीं करते और ऐसी ठो-ठांय मचाते हैं कि हिंसा और आगजनी के बीच शौर्य अंगडाई लेता रहता है और जातीय अस्मिता नारी अस्मिता के साथ घूमर नाचती रहती है । इस जश्न में कहीं टायर जलते हैं, तो कहीं गाड़ियाँ ! देश का चक्का जाम होते ही उनकी कलाबाजी सिद्ध हो जाती है । कलाबाज सरकारें भी उन्हें नैतिक समर्थन देकर देश के लोकतन्त्र को लोहालाट बनाती हैं ।

अभिव्यक्ति की आज़ादी सभी को है । जिसको जो बकना है, बके; कलाबाजों के कानों में तो सदियों से रुई ठुँसी हुई है । मीडिया के मुँह में तो सत्ता का दही जमा है । बौद्धक कुछ भी कहे, लेकिन जब तक उनके पास कलाबाजों का कलाबाज मुखिया है, उन्हें किस बात की फ़िक्र!


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें

www.000webhost.com