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वर्ष: 2, अंक 33,  मार्च(द्वितीय), 2018



विश्वमहिला दिवस: 8 मार्च पर विशेष

बदलता दौर , उभरती नारी
आओ करें सलाम वामा को !


बादल घनश्याम


बदलाव प्रकृति का नियम है जो वक्त के साथ बदल जाए वह बचा , बना रहता है उसका न केवल अस्तित्व ही बना रहता है अपितु वह अगर लगातार समय के अनुसार या उससे आगे चले तो उसी का वर्चस्व भी हो जाता है । समय की धारा में हमेशा कोई भी एक सी हालत में नहीं ही रहता है । उतार चढ़ाव व उन्नति अवनति लगी ही रहती है । कहा भी जाता है कि समय और ज्वार किसी की प्रतीक्षा नहीं करते चलती गाड़ी की तरह जो उस पर सवार हो गया वह औरों से आगे निकल गया पर वही अगर चलती गाड़ी से बेबात या शेखी में कूदने लग या खुद आलस या प्रमाद में डूब कर्महीन हो जाए तो फिर उसका पतन भी तय ही है ।

स्त्री हो पुरूष यह नियम सब पर समान रूप से लागू होता है । दोनों अपनी अपनी तरह से समय के साथ डूबते उतराते रहे हैं ।

समर्थ से लाचार नारी

प्राचीन भारत की विदुषी , व सामर्थ्यवान नारी जब पर्दे में कैद हो गई , उसके लिए ज्ञान के दरवाजे बंद हो गए , उसने इसे अपनी नियति मान लिया तो मुगल काल तक आते आते वह हरम की शोभा बन कर रह गई , पुरूष की कामुकता व कामवासना पूरी करने का साधन मात्र बन गई । समाज में उसकी महत्ता कम होनी ही थी से हुई । अब वह एक दोयम दर्जे की नागरिक बन कर रह गई । उसके सारे निर्णय पुरूष लेने लगा । यहां तक कि कभी अपनी मर्जी से स्वयंवर करने वली नारी से उसके विवाह तक के बारे में पूछना , उसकी मंशा जानने तक का हक छीन उसे किसी पशु की ही तरह पुरूष के पीछे बांधा जाना लगा भले ही उसे भारत में अद्र्धांगिनी कहा जाता रहा हो पर हैसियत उसकी पैर की जूती की हो गई और पहले राजनैतिक कारणों से होने वाले बहुविवाह अब पुरूष के लिए शौक और हैसियत व ताकत प्रदर्शन के सबब बन गए एक तरह से कहें तो स्त्री विमर्श के हिसाब से नारी के लिए यह एक घोर काला युग बन कर आया था ।

मर्द की मुठमर्दी

पर , परिवर्तन भी प्रकृति का शाश्वत नियम है , पता नहीं पुरूष की अहंमनस्यकता , उसकी मुठमर्दी या उसकी जोर जबर्दस्ती , व प्रमाद ने यह किया या लगातार शोषण की चक्की में पिसने च अत्याचार सहने से उसका स्वाभिमान जाग उठा । अथवा उसके सामने खत्म हो जाने या फिर उठकर लड़ने व जागने के अलावा कोई चारा ही नहीं बचा और उसने दूसरा विकल्प चुना ।

जाल की काट सीखी

इस दूसरे विकल्प पर चलना या उसे अपनाना कोई सरल काम नहीं था क्योंकि छाती पर सवार समाज , प्रथाएं व पुरूष आसानी से उसे उबरने देने वाले नहीं थें सो उस पर मान्यताओं , रिवाजों , परंपराओं व पुरूष की प्रधानता के सारे हथकंडे व हथियार चलाए गए । इस षड़यंत्र में नारी जगत का ही एक बड़ा हिस्सा भी डर , अज्ञान या अनजाने में ही शामिल हुआ और एक लंबे कालखंड तक यह कुचक्र सफल होता रहा पर समय के साथ स्त्री इस जाल की काट भी सीख गई और आज वह सीना तान कर पुरूष के बराबर खड़ी नज़र आ रही है बल्कि कई क्षेत्रों में तो उससे कहीं आगे भी है । यही है नारी शक्ति के जागरण का उद्भव काल ।

तकनीकी ने दी ताकत

अगर नारी चिंतन के पैरोकारों की बात मानें तो स्त्री की उन्नति में सबसे बड़ी भूमिका उसकी शिक्षा व ज्ञान के साथ ही उसकी जीजिविषा ने निबाही है । उसके साथ ही तकनीकी ने भी एक बड़ी भूमिका का निर्वहण किया है । अब चूंकि उसे फिजिकल पावर यानि मसल पावर अथवा बाहुबल का ज़माना नहीं रहा है बल्कि तकनीकी काबिलियत ही असली ताकत बनकर उभरी है तो मांउ पेशीय बल पर इतराते पुरूष का वर्चस्व भी घटा है । अब आप एक बटन को दबाकर , मशीनों की मदद से , रिमोट कंट्रोल से , तरंगीय ताकत से , नैनो टेक्नोलाजी से बहुत कुछ वह कर सकते हैं कल तक जिसके लिए शारीरिक ताकत चाहिए थी । और इसी ताकत का कमाल है कि अब , कल तक दिनों या महिनों में किया जााने वाला काम घंटों या मिनटों में हो जाता है और नारी के लिए यह बदलाव बड़े काम का सिद्ध हुआ है। उसकी कोमल उंगलियां फर्राटे से कंप्यूटर पर जिस गति से चलती हैं उतनी गति व दक्षता से शायद मर्द की कठोर व लोच रहित उंगलियां नहीं चल पाती और कंप्यूटर के बढ़ते उपयोग व उसके दायरे में आते लगातार विस्तृत होते क्षेत्र ने नारी को नई ताकत व सामथ्र्य दी है तो नारी ने भी लपक कर उसे हाथों हाथ लिया है ।

लड़ाका होने का दिया सबूत

इसी तकनीकी ताकत के चलते आज की स्त्री ने हर क्षेत्र में अपनी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज करवाने में कामयाबी पाई है । कभी अपनी शारीरिक संरचना के चलते साइकिल तक चलाने में घबराने वाली लड़कियां अब बाइक व स्कूटी ही नहीं दौड़ा रहीं हैं बल्कि कार और विमान से होती हुई लड़ाकू जैट तक पंहुची हैं तो यह उनके लड़ाका होने का सबूत भी है । खेलों में अब वह केवल हल्के फुल्के गेम नहीं खेलती अपितु मुक्केबाजी , कुश्ती , से होती हुई सूमो व डब्ल्यू डब्ल्यू ई तथा ग्रीको रोमन कुश्ती , फ्री स्टाइल कुश्ती, पर्वतारोहण , भारोत्तलन व एयरडाइविंग तक कर रही है । अमेरिका के बाद यूरोप से होती हुई वह भारतीय सेना के तीनों अंगों में आ चुकी है । बेशक यह नारी शक्ति के उभार का नया दौर है ।

कारपोरेट जगत ने पहचानी ताकत

नारी की ताकत को कारपोरेट जगत ने भी पहचाना है उसे एक नई पहचान दी है आज इंदिरा नुई होना या अंजलि भट्टाचार्य होना कमजोरी की नहीं अपितु ताकत की पहचान बना है । कल तक किरण बेदी या पी टी उषा पर गर्व करने की छोटी सी लिस्ट बहुत लंबी चुकी है । निर्मला सीतारामन , सुषमा स्वराज व स्मृति इरानी के रूप में भारत की तो रक्षामंत्री व विदेशमंत्री तथा सूचना प्रसारण मंत्री भी महिलाएं ही हैं और तीनो ही मंत्रालय केन्द्र सरकार के लिए गर्व व गौरव के सबब बन रहे हैं । रफ टफ राजनेता भी देखने हों तो ममता बैनर्जी व मायावती किसी को छकाने के लिए पर्याप्त हैं । उसकी ताकत को ज़्यादा ही आजमाने का शौक हो तो मैरीकोम का मुक्का खाकर देखा जा सकता है ।

वामा को सलाम !

नारी ने बुलंदी के नए से नए आसमान बनाएं हैं व छुए हैं उसने हर पल एक नया इतिहास लिखा है कम से कम इक्क्ीसवी सदी में तो वह किसी से उन्नीस न रहने का जीवट व दमखम रखने का संदेश दे ही चुकी है । और आज का यह 8 मार्च का दिन एक निगाह वामा को सलाम बजाने मौका है । शर्माइए मत , अब वें ज़माने लद गए जब नारी को घर की शोभा बता कर उसे बाहर की खुली हवा में सांस लेने से रोका जाता था या उसे सलाम करने में पुरूष की हेठी होती थी । आज तो वह घर बाहर , दफ्तर खेत , खलिहान , ज़मीन , आसमान , रेत , समंदर , बाहर अंदर सब जगह अपनी छाप छोड़ चुकी है बराबर कमाती है डटकर काम करती है और ज्ञान ले ही नहीं रही अपितु ज्ञान के नए नए दरवाजे ढूंढ व खोल रही है और अप्रतिम होती स्त्री को नमन करने या सलाम करना शर्म नहीं गर्व का सबब होना चाहिए न !


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