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वर्ष: 2, अंक 33,  मार्च(द्वितीय), 2018



महंगा सौदा


जयश्री रॉय


हवा, धूप से वंचित उस छोटे-से सीलन भरे कमरे में अजीब-सी घुटन थी। अपनी टाई ढीली कराते हुये मैंने चारों तरफ नजर दौड़ाई थी। दारिद्रय की छाप हर जगह स्पष्ट दिख रही थी- पलस्तर उखड़ी रंग उडी दीवारें, टूटे-फुटे फर्नीचर, बिस्तर पर बिछी गंदी-चिकट चादर... शायद घर के पास से हो कर कोई नाली बह रही थी। रह-रह कर दुर्घन्ध के भभाके उड़ रहे थे। मैं मन ही मन क्षुब्ध हो उठा था। यह दलाल मुझे कैसी जगह ले आया था! कह रहा था इस छोटे कस्बे में इससे बेहतर बंदोबस्त हो नहीं सकता।

अपने फैले हुये व्यापार के सिलसिले में मुझे आए दिन दुनिया भर में घूमते रहना पड़ता है। तनाव और ऊब से निजात पाने के लिए अक्सर खूबसूरत सोहबत में अपनी शामें गुजारा करता हू। घर में सुंदर, सुशील पत्नी है। पर एकरसता से बचाने के लिए जीवन में कुछ विविधता होनी ही चाहिए। इससे जीवन में ताजगी बनी रहती है और तनाव मुक्त रहने की वजह से वैवाहिक जीवन भी अच्छी तरह से निभाया जा सकता है।

अपने ख्यालों में खोया ना जाने कब तक मैं चुपचाप अकेला बैठा रह गया था। अचानक एक पंद्रह-सोलह साल की किशोरी ने कमरे में प्रवेश किया तो मैं कौंक कर सजग हुआ। लड़की के एक हाथ में लैंप था। उसकी पीली रोशनी में उस पर नजर पड़ते ही ना जाने क्यों मुझे झटका लगा था। उसका चेहरा जाना-पहचाना-सा लगा था।

अपने हाथ के लैंप को मेज पर रखते हुये वह कृतिम ढंग से मुस्कराई थी। लैंप की सुनहरे आलोक मेन उसके कंधों पर फैले बाल झिलमिला उठे थे। साथ ही मेज पर रखी वह तस्वीर भी जो कमरे में उतरे शाम के धुंधलके में अब तक डूबी हुई थी। एक पल के लिए जैसे मेरे सांस ही रुक गई थी- रमिता! ओह! तो यह रमिता की बेटी है! एक ही क्षण में मेरे आँखों के सामने सब स्पष्ट हो उठा था।

कई साल पहले मैंने रमिता को बहुत ही निर्ममता से अपने जीवन से काट कर अलग कर दिया था। एक बाजारू स्त्री होने के बावजूद वह बेहद संवेदनशील थी। उसे मुझसे प्यार हो गया था। गर्भ ठहर जाने पर वह किसी भी तरह उसे गिराने पर राजी नहीं हो रही थी। अंत में मुझे कठोर होना ही पड़ा था। मगर अपने निर्णय पर वह अंत तक अडिग बनी रही थी।

मैंने भीतर ही भीतर थरथराते हुये लैंप की । रोशनी में उस किशोरी की भ्रमर काली आँखों की ओर देखा था- सांध्य तारा-सी उजली और स्वप्नील... घनी बरौनियों से घिरी। बिल्कुल मेरे माँ की आँखें! यकायक मेरा बदन घुला उठा था। किसी तरह अपनी जेब से दो हजार का नोट निकाल कर सामने की मेज पर रखा था और लगभग दौड़ते हुये उस कमरे से बाहर निकाल आया था। पीछे से वह किशोरी जिसका नाम शायद मनीषा था, मुझे पुकारती रह गई थी।

तंग गली के बाहर खड़ी अपनी कार की पिछली सीट पर पसीना पोंछते हुये मैं निढाल-सा पड़ गया था। यह ख्याल मुझे रह-रह कर परेशान कर रहा था कि शायद आज इस देह की मंडी में मैं अपनी ही बेटी की कीमत लगा आया हूँ। मैं एक बहुत सफल व्यापारी था। मगर आज जैसे इस सौदे में अपना सब कुछ हार बैठा था। यह मेरे अब तक के जीवन का सबसे बड़ा घाटे का सौदा था जिसकी भरपाई अब शायद कभी ना हो पाये। मैं खरीदने के भ्रम में आज अपनी ही इज्जत बाजार में बेच आया था।


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