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वर्ष: 2, अंक 33,  मार्च(द्वितीय), 2018



कर्तव्य परायणा


राजीव कुमार


बड़े परिवार की जिम्मेवारी उठाना, सबकी जरूरतों का ख्याल रखना, सबके सुख-दुःख का साथी बनना, यही काम सर्वश्रेष्ठ रह गया था बड़ी भाभी के लिए। वो कर्तव्य परायणा स्त्री थी, हालांकि इतनी पढ़ी-लिखी नहीं थी कि कर्तव्य परायणा का मतलब समझती।

सुबह-सुबह बिस्तर का त्याग कर देना। पति, बच्चों और सारे सदस्यों के लिए नाश्ता बनाना, बच्चों को तैयार करना, मतलब कि घर का सारा काम निपटाकर अन्न ग्रहण करना। ये सब भाभी की दिनचर्या में शामिल था और इतना करने में उनको दो-तीन बज जाते थे। उतने समय में उनके देवर और ननदें दो बार नाश्ता कर लेते थे।

पता नहीं बड़ी भाभी को इतना काम करने में, सबकी सेवा करने में कौन-सा आनंद आता था या फिर कोई सामाजिक-पारिवारिक दबाव था।

“आज खाना स्वादिष्ट नहीं बना है। आज दाल में घी नहीं है। आज तो मेरा पेट भी नहीं भरा। बड़ी भाभी ने सब खा लिया।’’ ये शिकायतें बड़ी भाभी को रोज ही सुनने को मिल जाया करती थीं। जबकि सच तो यह है कि बचे-खुचे भोजन में उनका पेट भी नहीं भरता था। छोटे-मोटे बुखार, सिरदर्द और कमर दर्द को नजरअंदाज करना उनकी आदत सी बन गई थी।

मैंने तो कितनी बार कहा कि ‘‘भाभी, आप अपनी स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखतीं।’’

“क्यों नहीं रखती रे?’’ भाभी ने उत्सुकतावश प्रश्न किया।

आप सभी का इतना खयाल रखती हैं। सारा कर्तव्य निभाती हैं। देर से खाना खाती हैं, वो भी आधा पेट।

“आप भैया के व्यवसाय में उनका हाथ क्यों नहीं बटातीं? आपका मन भी लगा रहेगा।’’

भाभी ने ठहाका लगाया और बोली, “चुप कर, अगर सासू मां ने सुन लिया तो तुम्हारा घर आना-जाना मना हो जाएगा। वैसे मैं तुम्हारी बात से सहमत हूं।’’

आखिर वही हुआ, विनोद भैया की मां ने सब सुन लिया। बाहर के दरवाजे के पास हमको रोककर घूरते हुए बोली, ‘‘मेरी बहू को मत भड़काया कर, नहीं तो घर आना-जाना बंद कर दे। तुम क्या समझते हो, तुमने अपनी पत्नी को काम पर लगाकर अच्छा काम किया है?’’

बहुत दिनों तक विनोद भैया के घर आना-जाना नहीं हुआ। दुकान जाकर ही भाभी की खबर ले लेता था। एक दिन अचानक मालूम हुआ कि बड़ी भाभी अब इस संसार में नहीं रहीं।

देर से अन्न-जल ग्रहण करना, कम आराम करना, बहुत बड़ी बीमारी को निमंत्रण दे चुका था।

उनके घर गया तो विनोद भैया फूट-फूटकर रो रहे थे और कह रहे थे, ‘‘तुम्हारी तरह मैं भी अपनी पत्नी को किसी व्यवसाय में लगा देता तो आज इस संसार में होती।’’

मैंने मन ही मन में खुद से बात की, “अब सोचने और पछताने का क्या फायदा? कर्तव्य परायणा भाभी अब तो सारे कर्तव्यों से मुक्त हैं।’’


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