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वर्ष: 2, अंक 33, मार्च(द्वितीय), 2018



मैं रोया था


अर्पित ‘अदब’


मैं रोया था......

द्वारे पर संदेशा आया
बरसाने से इक लड़की का
काम अधूरा छोड़ दिया फिर
मैंने उस दिन जो कुछ भी था
एक लिफाफा जिस के अंदर
मिला निमंत्रण था मिलने का
या तो खिलकर मुरझाने का
या फिर मुरझाकर खिलने का
उसी रोज़ हाँ शाम को पहली बार
मैं घंटों तक सोया था
मैं रोया था...

नीली वाली शर्ट जचेगी
या फिर पीला कुर्ता पहनूँ
मन में उस की बातें रुक रुक
खुद ही अपने आप से कह लूँ
कब से उलझन काट रही है
उस को मिलकर क्या देना है
भाभी से बिंदी लेनी है
स्टेशन से सुरमा लेना है
रस्ते से जो पसंद उसे है
वही मिठाई ले जाऊँगा
जो कुछ मन में सोच रखा है
क्या मिलकर भी कह पाउँगा
लगता है कि मिल जाएगा
जो कुछ भी अब तक खोया था
मैं रोया था !

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