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वर्ष: 2, अंक 33, मार्च(द्वितीय), 2018



जीवन कभी घना अँधेरा


नरेंद्र श्रीवास्तव



जीवन कभी है घना अँधेरा।
जालों-जंजालों  का  घेरा।।

खुद से खुद बतियाते रहते।
मानो मन मेहमानो का डेरा।।

दूर-दूर  तक  टिकें  निगाहें।
सब खाली,सब लिये अँधेरा।।

यहाँ उजाले में ही सब आते।
हुआ अँधेरा,सबने मुँह फेरा।।

ये दुनिया है दो रूपों वाली।
भीड़ उजाला,तन्हा अँधेरा।।

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