Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 33, मार्च(द्वितीय), 2018



नज़र खुद से...


डॉ. दिनेश त्रिपाठी ‘शम्स’


 
नज़र खुद से मिलाने में पसीने छूट जाते हैं ,
खुदी को आजमाने में पसीने छूट जाते हैं |

हमारी मुस्कराहट से सभी को रश्क होता है ,
मगर यूँ मुस्कुराने में पसीने छूट जाते हैं |

मुहब्बत आपने कर ली ये अच्छी बात है लेकिन ,
मुहब्बत को निभाने में पसीने छूट जाते हैं |

हुनर को बेच लेने का हुनर आता नहीं सबको ,
मुनासिब दाम पाने में पसीने छूट जाते हैं |

फसल नफरत की पैदा कर रहे हैं अब सियासतदां ,
अमन के गुल उगाने में पसीने छूट जाते हैं |

पुरानी बात है जब आँच सच से दूर रहती थी ,
अभी सच को बचाने में पसीने छूट जाते हैं |

ये जो उम्मीद की लौ है इसे बुझने न दें  यारो ,
अँधेरे को मिटाने में पसीने छूट जाते हैं |

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें

www.000webhost.com