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वर्ष: 2, अंक 33, मार्च(द्वितीय), 2018



सोचते रहने से फतह कहाँ होती है !


डॉ० अनिल चड्डा


    
कभी तो बात की इन्तहा होती है,
बिन दीए, रौशनी कहाँ होती है !

चलते रहने से गुरेज़ न कर कभी,
वरना मंजिलें तय कहाँ होती हैं !

कौन मिला है अपना कभी वीरानों में,
जुदाई वहीं, दोस्ती जहाँ होती है !

न अफसोस कर दिल के टूट जाने का,
गमीं वहीं, खुशियाँ जहाँ होती हैं ।

दास्ताँ यूँ ही अधूरी न छोड़ अपनी,
सोचते रहने से फतह कहाँ होती है !


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