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वर्ष: 2, अंक 33, मार्च(द्वितीय), 2018



नारी


डॉ0 सुरंगमा यादव


      
नारी अबला है नहीं,ज्ञान बु़द्धि की खान।
रत्न बने तुलसी यहाँ, पा रत्ना से ज्ञान।। 1

कन्या पूजन करते हैं, खूब रचाते ढोंग।
बेटे की चाहत लिए, बिटिया मारें लोग।। 2
  
देकर छोटी चादरा, कहें ना बाहर पाँव।
अग्नि परीक्षा दी मगर, मिली ना ठण्डी छाँव।। 3

जब जब अपने देश में, नारी लज्जित होय।
धरती की छाती फटे,   भारत  माता रोय ।।4

रोटी कपड़ा और छत ,नारी जीवन  मोल ।
नारी मन की बात का, नहीं समझते मोल ।। 5

छंटने वाली धुंध  है,   बदलेगा यह दौर ।
नारी शक्ति जाग उठी, अलख जगी चहुँओर।। 6

नारी पर लादे सभी, नियम रिवाज विधान ।
अपनी सुविधा से रचे, सारे शास्त्र पुराण ।। 7

आज किसे अपना कहें, किसको माने गैर ।
बेटा माँ से कह रहा, नहीं तुम्हारी खैर।। 8

कामुक नजरें घूरतीं,   नारी  को बेखौफ।
पुलिस प्रशासन का नहीं, इनको है कुछ खौफ।।9 

नारी को लज्जित करें, समझें खुद को शूर।
खुद अपने पुरुषत्व को, करें कलंकित क्रूर।।10 
                                       

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