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वर्ष: 2, अंक 33, मार्च(द्वितीय), 2018



गरमी अऊ पानी


महेन्द्र देवांगन माटी



गरमी आवत देख के , तोता बोले बात ।
पाना नइहे पेड़ मा , कइसे कटही रात ।।

झरगे हावय फूल फर , कइसे भरबो पेट ।
भूख मरत लइका सबो , जुच्छा हावय प्लेट ।।

नदियाँ नरवा सूख गे , तरिया घलव अटाय ।
सुक्खा होगे बोर हा , कइसे प्यास बुझाय ।।

पानी खातिर होत हे , लड़ई झगरा रोज ।
मार काट होवत हवय,  थाना जावत सोज ।।

टपकत हावय माथ मा    , पसीना चूचवाय ।
गरम गरम हावा चलत , अब्बड़ घाम जनाय ।।

कइसे बांचे जीव हा  , चिन्ता सबो सताय ।
पानी नइहे बूंद भर ,  मोला रोना आय ।।


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