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वर्ष: 2, अंक 33, मार्च(द्वितीय), 2018



गुजराती कविता का हिन्दी काव्यनुवाद -
"हे परमेश्वर !"


कवयित्री : कुंदनिका कापड़िया
अनुवादक : डॉ.रजनीकान्त एस.शाह



हे परमेश्वर !
तुमने हमें उत्तम मित्र दिये हैं
इसलिए मैं आभारी हूँ
मित्रो –
जिनकी संगति मे दु:ख बंट जाते हैं
और खुशियाँ दुहरी हो जाती हैं ,
जिनके समक्ष हम जैसे हैं वैसे ही
प्रकट हो सकते हैं
और जिनके पास
निखालिसता के साथ दिल खोल सकते हैं ।
वे हमें हमारी निर्बलताओं केसाथ अपनाते हैं
और हमारे भीतर ऐसी संवेदना प्रेरित करते हैं
कि उन्हें हमारी आवश्यकता है।
जिनसे मिलकर हम सहज हो जाते हैं
और समृद्ध भी होते हैं।
गलतफहमी होने
या मित्रता के खतरे में पड़ने के बिना किसी भय के हम जिनके
विचार या कार्यों का विरोध कर सकते हैं।
और उस विरोध के पीछे छिपे प्रेम को जो समझ सकते हैं।
जो लंबे समय से टीके हुए हैं
समस्त आँधियों में साथी बने हैं
और भविष्य में भी वे साथ साथ ही होंगे
ऐसा विश्वास जिनके लिए रखा जा सकता है ,
वे हमारे लिए कुछ छोड़ते हैं
और वे इसका अहसास तक नहीं रखते,
तुमने हमें ऐसे मित्र दिये हैं
एतदर्थ हम तुम्हारे प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
परमात्मा ,हमें भी ऐसे मैत्रीभाव से भर दो
कि हम अपने मित्रों की प्रकट संभावनाओं को पहचान सकें
और उसे बाहर लाने में सहायक हों।
हमारी खामियाँ ,कमज़ोरियाँ , भूलों को दूर हटाने
और सात्विकता,सत्यनिष्ठा,निर्भीकता बढ़ाने के प्रयत्नों में
हम एक दूसरे को सक्रिय सहयोग प्रदान करें।
हमारे अच्छे दिनों में जो हमारे साथ थे
उनकी राह दुर्दशा की घाटी से गुजरे
तब हम उन्हें भूलें नहीं।
ईश्वरत्व का अंश जिस में प्रतिबिम्बित होता है ऐसे इस
उत्तमोत्तम मानव संबंध का हमें वर दो प्रभु !


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