मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 80, मार्च(प्रथम), 2020

सम्मान भाव

डॉ० आर बी भण्डारकर

सम्मान सिंह के अंतर्मन में बहुत दिनों से एक विचार कुलबुला रहा था।आज इस विचार को अमलीजामा पहनाते हुए उन्होंने एक संस्था का गठन कर ही डाला।संस्था का नाम रखा-समता मूलक मानव समाज।लक्ष्य रखे-प्रथम,मानव समाज में वर्ण,जाति, रंग,लिंग आदि की दृष्टि से व्याप्त भेदभाव मेंटना।द्वितीय,समाज में अच्छे संस्कार रोपित करने के लिए काम करना।

सम्मान सिंह की सामाजिक कद-काठी के लिहाज से लोग धड़ल्ले से संस्था की सदस्यता लेने लगे।देखते ही देखते यह संख्या हजारों में हो गयी।

संस्था के उद्देश्यों से प्रभावित होकर पढ़ने लिखने में रुचि रखने वाले ,पर आज के मानव समाज में कमतर पायदान पर माने जाने वाले दुर्बल राम के मन में भी इस संस्था की सदस्यता ग्रहण करने की इच्छा जोर मारने लगी; सो एक दिन सदस्यता का आवेदन पत्र ले कर संस्था के कार्यालय में पहुँच गए ; सम्मान सिंह को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और अपना सदस्यता आवेदन पत्र उनके सामने पेश कर दिया।

"ठीक है, ठीक है दुर्बलराम जी;संस्था की सदस्यता समिति शीघ्र ही आपको यथोचित सूचना भेजेगी।"

आज दुर्बलराम अत्यंत चिंताग्रस्त हैं।हों भी क्यों नहीं, उन्हें समता मूलक मानव समाज संस्था का पत्र मिल गया है जो,जिसमें लिखा है- "संस्था में उपस्थित होने के समय आपमें संस्था के प्रति उचित सम्मान भाव न पाए जाने से आपका सदस्यता आवेदन पत्र अमान्य कर दिया गया है।"


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें