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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 80, मार्च(प्रथम), 2020

दोस्ती

राजीव कुमार

मन के बार-बार मना करने के बावजूद भी रचना ने मित्रता के लिए पहल की, श्रेष्ठ में कुछ खास दिखा था उसको, एक अच्छा इंसान दिखा था। रचना इससे पहले एक लड़के की दोस्ती को दो दिन में ही ताड़ कर उससे दूरी बना चुकी थी। कुछ दिन इन्तजार करने के बाद रचना और श्रेष्ठ आमने-सामने हुए। रचना ने हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा ’’ श्रेष्ठ मुझसे दोस्ती करोगे?’’ श्रेष्ठ के वहाँ से चले जाने के बाद रचना को एहसास हुआ कि उसका मन दोस्ती करने का नहीं है। रचना उसको घमन्डी और अकड़ू समझकर दूसरे मौके की तलाश करने लगी। दोनों का आमना-सामना हुआ, वैसी जगह पर जहाँ रचना ने सोचा न था। रचना ने इधर-उधर नज़र दौड़ायी, दिल के मचलते हुए अरमान को और हवा दी। रचना ने कहा’’ श्रेष्ठ मैं तुम्हारी दोस्त बनना चाहती हूँ।’’ श्रेष्ठ ने कन्नी काटनी चाही लेकिन झुंझला कर कहा ’’ मैं दोस्ती करूंगा लेकिन मेरी एक शर्त है।’’

रचना को ऐसा लगा मानो कि बहुत बड़ी चट्टान उसके सिर को कुचल गई है। रचना के मन-मस्तिष्क पर इससे पहले वाली , दो दिन वाली दोस्ती के जख्म और भी तरोताजा हो गए। श्रेष्ठ की बातों से कुठाराधात तो हुआ था। दिल की बात न मानकर खुद को मसोस रही थी। सपना टूट चुका था। दोस्ती का भूत लगभग उतर चुका था। वो समझ चुकी थी कि सारे लड़के एक जैसे ही होते हैं। फिर भी रचना ने अपने दिल पर एक बड़ा सा पत्थर रखा। अपनी हथेली की पाँचों अंगुलियों में से आसमान पर तीक्ष्ण दृष्टि डालकर श्रेष्ठ को समझाते हुए बोली ’’ श्रेष्ठ, दोस्ती तो दोस्ती होती है, दोस्ती में कोई शर्त नहीं होती है। ’’

श्रेष्ठ ने कहा ’’ मेरी शर्त मानोगी तभी मैं दोस्ती करूंगा। ’’ दोस्ती में शर्त के अड़ियल रवैये को देखकर वो झेंप गई। रचना श्रेष्ठ के सामने दीवार बनकर खड़ी हो गयी। उसकी आँखें एकटक श्रेष्ठ को निहार रहीं थी। रचना ने पूछा ’’ बताओ अपने गन्दे शर्त खुलकर बताओ। ’’

श्रेष्ठ ने अपनी नज़र ग्लानी से झुका ली। और लड़खड़ाती हुई आवाज में कहा ’’ जब भी हमारी दोस्ती में दरार पैदा हो, शक की गुजाइश लगे, तुमको जाने का मन करे, तो चुप-चान मत चली जाना। अपनी बातों को साबित करने का पूरा मौका देना।’’

रचना ने अपनी दाएं हाथ की पाँचों अंगुलियों में से आसमान की तरफ देखकर श्रेष्ठ की तरफ देखा तो उसकी आँखों में आँसु आ गए। रचना का फिर से अपनी तरफ बढ़ा हुआ हाथ अपने हाथ में लेकर श्रेष्ठ की आँखें भी नम हो आईं। श्रेष्ठ और रचना की पवित्र दोस्ती जगजाहिर हुई। श्रेष्ठ रचना ने सबको अपनी ओर आकर्षित किया। बार-बार सोचने पर मजबूर किया। कल, आज और कल भी श्रेष्ठ रचना हर लेखक को उकसाती रहेंगी और जिसका इंतजार हर पाठक बेसब्री से करता रहेगा।


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